समुद्री इलाकों के मछुआरों में भारी जालों को खींचने से होने वाली रोटेटर कफ (कंधे) की चोटें
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समुद्री इलाकों के मछुआरों की मूक व्यथा: भारी जालों से होने वाली ‘रोटेटर कफ’ (कंधे) की चोटें

भारत की लगभग 7,500 किलोमीटर लंबी तटरेखा न केवल देश की अर्थव्यवस्था का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, बल्कि यह लाखों मछुआरों की आजीविका का एकमात्र साधन भी है। जब हम समुद्र तटों की कल्पना करते हैं, तो हमारे दिमाग में लहरों की शांति और ताजी हवा का चित्र उभरता है। लेकिन इन लहरों से जूझने वाले मछुआरों का जीवन उतना ही कठिन और संघर्षपूर्ण होता है। चिलचिलाती धूप, तूफानी हवाओं और गहरे समुद्र के खतरों के बीच, मछुआरे हर दिन एक शारीरिक युद्ध लड़ते हैं। इस पेशे में सबसे आम और गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं में से एक है—कंधे की चोट, जिसे चिकित्सा भाषा में ‘रोटेटर कफ’ (Rotator Cuff) की चोट कहा जाता है।

समुद्र से पानी और मछलियों से भरे भारी भरकम जालों को खींचना कोई साधारण काम नहीं है। इस लेख में हम विस्तार से जानेंगे कि रोटेटर कफ क्या है, मछुआरों में यह चोट क्यों इतनी आम है, इसके लक्षण क्या हैं, और इस गंभीर समस्या से कैसे बचा जा सकता है।


रोटेटर कफ (Rotator Cuff) क्या है?

मानव शरीर में कंधे का जोड़ (Shoulder Joint) सबसे अधिक लचीला और मूवेबल जोड़ होता है। यह हमें अपने हाथों को किसी भी दिशा में घुमाने, उठाने और काम करने की स्वतंत्रता देता है। इस जोड़ को स्थिरता प्रदान करने और हाथ को घुमाने (Rotation) का काम चार प्रमुख मांसपेशियों और उनके टेंडन्स (मांसपेशियों को हड्डियों से जोड़ने वाले ऊतक) का एक समूह करता है। इस समूह को ही ‘रोटेटर कफ’ कहा जाता है।

रोटेटर कफ में शामिल चार मांसपेशियां हैं:

  1. सुप्रास्पाइनेटस (Supraspinatus): बांह को ऊपर उठाने में मदद करती है।
  2. इन्फ्रास्पाइनेटस (Infraspinatus): बांह को बाहर की तरफ घुमाने में मदद करती है।
  3. टेरिस माइनर (Teres Minor): यह भी बांह को बाहर की ओर घुमाने में सहायक है।
  4. सबस्केपुलरिस (Subscapularis): बांह को अंदर की तरफ घुमाने का काम करती है।

जब कंधे पर लगातार बहुत अधिक दबाव पड़ता है या कोई अचानक झटका लगता है, तो इन मांसपेशियों या टेंडन में सूजन (Tendinitis) आ सकती है या वे फट (Tear) सकते हैं।


मछुआरों में रोटेटर कफ की चोट के मुख्य कारण

मछली पकड़ने का पारंपरिक तरीका अत्यधिक श्रमसाध्य है। विशेषकर उन छोटे और मंझोले मछुआरों के लिए जिनके पास जालों को खींचने के लिए मशीनी मोटर (Winch) की सुविधा नहीं होती, यह काम पूरी तरह से शारीरिक ताकत पर निर्भर करता है। रोटेटर कफ की चोटों के पीछे निम्नलिखित प्रमुख कारण होते हैं:

1. भारी जाल को हाथों से खींचना (Heavy Lifting): जब जाल पानी में होता है, तो उसमें मछलियों के वजन के साथ-साथ समुद्री पानी का भारी प्रतिरोध (Resistance) और फंसी हुई समुद्री घास का वजन भी जुड़ जाता है। इस भारी जाल को नाव पर खींचने के लिए मछुआरों को अपने कंधों और पीठ की पूरी ताकत लगानी पड़ती है। इस भारी वजन का सीधा असर रोटेटर कफ के टेंडन्स पर पड़ता है।

2. बार-बार एक ही गति को दोहराना (Repetitive Strain): रोटेटर कफ की चोट अचानक होने वाली दुर्घटना से ज्यादा, लंबे समय तक होने वाले ‘ओवरयूज़’ (Overuse) का परिणाम होती है। जाल को खींचने के लिए मछुआरे बार-बार एक ही तरह की हरकत (Repetitive motion) करते हैं। सालों तक यही काम करने से टेंडन्स में ‘माइक्रो-टियर’ (सूक्ष्म दरारें) आने लगती हैं, जो समय के साथ एक बड़े ‘टियर’ या फटने का रूप ले लेती हैं।

3. खराब शारीरिक मुद्रा (Awkward Posture): लहरों के बीच नाव लगातार हिलती रहती है। अस्थिर नाव पर खड़े होकर, झुककर और बांहों को सिर के ऊपर या शरीर से दूर खींचकर जाल खींचने से कंधे के जोड़ पर असामान्य दबाव पड़ता है। सही बायोमैकेनिक्स का अभाव चोट की संभावना को कई गुना बढ़ा देता है।

4. समुद्र की लहरों के कारण अचानक झटके (Sudden Jerks): कई बार जाल खींचते समय अचानक कोई बड़ी लहर नाव से टकराती है, या जाल किसी भारी समुद्री चट्टान में फंस जाता है। ऐसे में मछुआरे के कंधे पर अचानक बहुत तेज झटका लगता है (Acute Injury), जिससे रोटेटर कफ तुरंत फट सकता है।

5. उम्र और अपर्याप्त पोषण: उम्र बढ़ने के साथ-साथ टेंडन्स को खून की आपूर्ति कम होने लगती है, जिससे उनके फटने का खतरा बढ़ जाता है और ठीक होने की गति धीमी हो जाती है। इसके अलावा, कई पारंपरिक मछुआरों के आहार में प्रोटीन और कैल्शियम की कमी होती है, जो मांसपेशियों और हड्डियों को कमजोर बनाती है।


चोट के लक्षण और संकेत

मछुआरे अक्सर शुरुआती दर्द को नजरअंदाज कर देते हैं, क्योंकि उनका मानना होता है कि शारीरिक श्रम करने पर दर्द होना सामान्य है। लेकिन जब स्थिति गंभीर हो जाती है, तो निम्नलिखित लक्षण स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं:

  • कंधे में गहरा और सुस्त दर्द: यह दर्द कंधे के भीतर गहराई में महसूस होता है। विशेष रूप से रात में सोते समय (खासकर प्रभावित कंधे की तरफ करवट लेकर सोने पर) यह दर्द असहनीय हो जाता है।
  • बांह उठाने में कमजोरी: सबसे स्पष्ट लक्षण है हाथ को सिर के ऊपर उठाने (जैसे कपड़े पहनने या बाल संवारने) में कठिनाई होना। भारी सामान उठाना तो दूर, रोजमर्रा के सामान्य काम करना भी मुश्किल हो जाता है।
  • हाथ पीछे ले जाने में असमर्थता: हाथ को पीठ के पीछे ले जाने में बहुत तेज दर्द होता है।
  • क्रेपिटस (Crepitus): कंधे को घुमाते समय ‘क्रैकिंग’, ‘क्लिकिंग’ या ‘पॉपिंग’ (हड्डियों के रगड़ने) जैसी आवाजें आना।
  • कंधे का अकड़ जाना: दर्द के कारण लंबे समय तक कंधे का उपयोग न करने से “फ्रोजन शोल्डर” (Frozen Shoulder) की स्थिति भी उत्पन्न हो सकती है।

आजीविका और जीवन पर गहरा प्रभाव

रोटेटर कफ की चोट केवल एक शारीरिक दर्द नहीं है; यह एक मछुआरे के पूरे परिवार के लिए एक आर्थिक संकट है।

  • आजीविका का छिन जाना: मछुआरे की आजीविका उसके कंधों की ताकत पर निर्भर है। यदि कंधा काम करना बंद कर दे, तो वह समुद्र में नहीं जा सकता। दिहाड़ी पर काम करने वाले मछुआरों के लिए एक दिन काम न करने का मतलब है कि उस दिन घर में चूल्हा नहीं जलेगा।
  • इलाज का भारी खर्च: रोटेटर कफ की गंभीर चोटों के इलाज और सर्जरी (Arthroscopy) का खर्च बहुत अधिक होता है। गरीब मछुआरों के पास स्वास्थ्य बीमा (Health Insurance) का अभाव होता है, जिसके कारण वे अक्सर कर्ज के जाल में फंस जाते हैं।
  • मनोवैज्ञानिक दबाव: परिवार का भरण-पोषण न कर पाने की लाचारी और लगातार रहने वाला दर्द मछुआरों को अवसाद (Depression) और मानसिक तनाव की ओर धकेल देता है।

निदान (Diagnosis) और उपचार के विकल्प

यदि किसी मछुआरे को कंधे में लगातार दर्द रहता है, तो उसे तुरंत डॉक्टर (ऑर्थोपेडिक सर्जन) से मिलना चाहिए। डॉक्टर शारीरिक जांच के साथ-साथ एक्स-रे (X-ray) (हड्डियों की स्थिति देखने के लिए) और एमआरआई (MRI) या अल्ट्रासाउंड (Ultrasound) (मांसपेशियों और टेंडन में दरार देखने के लिए) का सुझाव देते हैं।

उपचार चोट की गंभीरता पर निर्भर करता है:

1. रूढ़िवादी उपचार (Conservative Treatment – बिना सर्जरी के): यदि टेंडन पूरी तरह से नहीं फटा है (Partial tear) या केवल सूजन (Tendinitis) है, तो इसे बिना सर्जरी के ठीक किया जा सकता है:

  • आराम (Rest): सबसे महत्वपूर्ण कदम है कंधे को आराम देना और भारी जाल खींचने से बचना।
  • बर्फ की सिकाई (Ice Therapy): दर्द और सूजन को कम करने के लिए दिन में कई बार बर्फ लगाना।
  • दवाएं: दर्द और सूजन कम करने वाली दवाएं (NSAIDs) लेना।
  • फिजियोथेरेपी (Physiotherapy): यह सबसे अहम हिस्सा है। फिजियोथेरेपिस्ट कुछ ऐसे व्यायाम सिखाते हैं जो कंधे के आसपास की अन्य मांसपेशियों को मजबूत बनाते हैं, ताकि रोटेटर कफ पर से दबाव कम हो सके।
  • स्टेरॉयड इंजेक्शन (Steroid Injections): यदि दर्द असहनीय है, तो डॉक्टर कंधे के जोड़ में कॉर्टिकोस्टेरॉइड का इंजेक्शन लगा सकते हैं।

2. सर्जरी (Surgical Treatment): यदि रोटेटर कफ पूरी तरह से फट गया है (Complete tear), या रूढ़िवादी उपचार से महीनों तक कोई फायदा नहीं हो रहा है, तो सर्जरी ही एकमात्र विकल्प बचता है। आजकल यह सर्जरी ‘आर्थ्रोस्कोपी’ (दूरबीन विधि) द्वारा की जाती है, जिसमें छोटे चीरे लगाकर फटे हुए टेंडन को वापस हड्डी से जोड़ दिया जाता है। रिकवरी में 4 से 6 महीने लग सकते हैं।


बचाव और निवारक उपाय (Prevention is Better Than Cure)

चूंकि मछुआरों का काम ही ऐसा है, इसलिए चोट के जोखिम को पूरी तरह खत्म नहीं किया जा सकता, लेकिन कुछ सावधानियां अपनाकर इसे काफी हद तक कम किया जा सकता है:

  1. मशीनीकरण (Mechanization): नावों पर मैनुअल श्रम को कम करने के लिए पुली (Pulleys) और मोटरीकृत विंच (Motorized Winches) का उपयोग करना सबसे प्रभावी तरीका है। इससे जाल खींचने का सारा भार मशीनों पर आ जाता है और कंधे सुरक्षित रहते हैं।
  2. सही शारीरिक मुद्रा (Ergonomics): जाल खींचते समय केवल बांहों और कंधों की ताकत का उपयोग करने के बजाय, अपनी रीढ़ की हड्डी को सीधा रखें और पैरों एवं कोर (पेट की मांसपेशियों) की ताकत का उपयोग करें। वजन को पूरे शरीर में बांटने से कंधों पर दबाव कम होता है।
  3. टीम वर्क (Teamwork): भारी जालों को अकेले खींचने का प्रयास कभी न करें। काम को कई लोगों के बीच बांटकर करने से किसी एक व्यक्ति पर अत्यधिक भार नहीं पड़ता।
  4. स्ट्रेचिंग और वार्म-अप (Stretching): समुद्र में उतरने और जाल फेंकने से पहले 5-10 मिनट तक कंधों और बांहों की हल्की स्ट्रेचिंग करें। इससे मांसपेशियां लचीली बनती हैं और अचानक झटके सहने के लिए तैयार हो जाती हैं।
  5. नियमित व्यायाम: काम के अलावा, खाली समय में कंधों और पीठ को मजबूत करने वाले व्यायाम (Strengthening exercises) करने चाहिए।

सरकार और समाज की भूमिका

मछुआरों की इस समस्या का समाधान केवल व्यक्तिगत स्तर पर नहीं किया जा सकता। इसके लिए संस्थागत समर्थन की आवश्यकता है:

  • सब्सिडी और तकनीकी सहायता: राज्य और केंद्र सरकारों को (जैसे प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना के तहत) पारंपरिक नावों को मशीनीकृत करने और विंच (Winches) लगाने के लिए भारी सब्सिडी देनी चाहिए।
  • स्वास्थ्य शिविर और जागरूकता: तटीय गांवों में नियमित रूप से ऑर्थोपेडिक स्वास्थ्य शिविर लगाए जाने चाहिए। मछुआरों को ‘ओवरयूज़ इंजरी’ (लगातार काम करने से होने वाली चोटों) के बारे में जागरूक करना आवश्यक है।
  • मछुआरों के लिए विशेष स्वास्थ्य बीमा: इस जोखिम भरे पेशे को देखते हुए, मछुआरों के लिए विशेष ‘कवरेज’ वाले स्वास्थ्य बीमा की व्यवस्था होनी चाहिए, जिसमें रोटेटर कफ जैसी काम से संबंधित चोटों की सर्जरी का पूरा खर्च शामिल हो।
  • वैकल्पिक रोजगार प्रशिक्षण: जब खराब मौसम या कंधे की चोट के कारण मछुआरे समुद्र में नहीं जा सकते, तो उनके लिए तटीय क्षेत्रों में वैकल्पिक रोजगार (जैसे मछली प्रसंस्करण या नेट रिपेयरिंग) के अवसर पैदा किए जाने चाहिए।

निष्कर्ष

समुद्र की छाती चीरकर हमारे लिए भोजन लाने वाले मछुआरे देश की अर्थव्यवस्था और खाद्य सुरक्षा की एक मजबूत रीढ़ हैं। लेकिन विडंबना यह है कि दूसरों का पेट भरने के लिए वे अपने ही कंधों को गला रहे हैं। रोटेटर कफ की चोटें उनकी अज्ञानता का नहीं, बल्कि उनकी मजबूरी और काम की कठोरता का परिणाम हैं। मशीनीकरण, सही ट्रेनिंग, और बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं के जरिए ही हम समुद्र के इन असली योद्धाओं को शारीरिक विकलांगता और आर्थिक बर्बादी से बचा सकते हैं। यह समय है कि हम उनकी मूक व्यथा को सुनें और उनके स्वास्थ्य को प्राथमिकता दें।

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