'भवाई' (पारंपरिक लोक नाटक) के कलाकारों के लिए भारी मुकुट और वेशभूषा से होने वाला गर्दन दर्द
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भवाई लोक नाटक: भारी मुकुट और वेशभूषा के पीछे छिपी कलाकारों के गर्दन दर्द की व्यथा

भारतीय संस्कृति अपनी विविध और समृद्ध लोक कलाओं के लिए विश्व भर में विख्यात है। इन्हीं अनमोल कलाओं में से एक है ‘भवाई’, जो मुख्य रूप से गुजरात और पश्चिमी राजस्थान का एक अत्यंत लोकप्रिय और पारंपरिक लोक नाट्य है। चौराहों, मंदिरों के प्रांगण और खुले मैदानों में मशालों या आधुनिक रोशनियों के बीच जब भवाई का प्रदर्शन होता है, तो दर्शक उसके रंग, ऊर्जा, संगीत और हास्य में पूरी तरह डूब जाते हैं। लेकिन इस जगमगाते मंच, तेज संगीत और कलाकारों की मनमोहक मुस्कान के पीछे एक गहरी और अनकही शारीरिक पीड़ा छिपी होती है—भारी मुकुटों और भारी-भरकम वेशभूषा के कारण होने वाला भयंकर गर्दन दर्द (Cervical Pain)।

यह लेख भवाई कलाकारों के जीवन के उस अनदेखे पहलू पर प्रकाश डालता है, जहाँ कला के प्रति उनका समर्पण उनके शारीरिक स्वास्थ्य, विशेषकर उनकी गर्दन और रीढ़ की हड्डी पर भारी पड़ता है।


भवाई की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और वेशभूषा का महत्व

भवाई की शुरुआत 14वीं शताब्दी में असैत ठाकर द्वारा की गई थी। इस नाट्य शैली में विभिन्न ‘वेश’ (नाटक के अलग-अलग प्रसंग) खेले जाते हैं, जैसे कि रामदेव वेश, जसमा ओडन, कान गोपी, और छैल छबीला। भवाई केवल मनोरंजन का साधन नहीं है, बल्कि यह समाज में जागरूकता फैलाने और पौराणिक कथाओं को जीवंत करने का एक माध्यम भी है।

इस नाट्य रूप की सबसे बड़ी विशेषता इसका अतिशयोक्तिपूर्ण (exaggerated) अभिनय और वेशभूषा है। चूँकि यह खुले मैदानों में हजारों दर्शकों के बीच खेला जाता है, इसलिए पात्रों को दूर बैठे दर्शकों तक अपनी उपस्थिति दर्ज कराने के लिए बेहद चमकीले, विशाल और भारी परिधान पहनने पड़ते हैं। राजाओं, देवताओं, दानवों और सेनापतियों का किरदार निभाने वाले कलाकारों को न केवल कई परतों वाले भारी कपड़े पहनने पड़ते हैं, बल्कि उनके सिर पर पीतल, तांबे, लकड़ी और भारी मोतियों से जड़े विशाल मुकुट या पगड़ियां भी रखी जाती हैं।


मुकुट और आभूषण: मंच का आकर्षण, शरीर का बोझ

एक सामान्य भवाई प्रदर्शन शाम को शुरू होकर देर रात या भोर तक चलता है। इस दौरान एक कलाकार को कई घंटों तक मंच पर अपनी वेशभूषा में रहना पड़ता है।

  • मुकुट का वजन: पारंपरिक रूप से बनाए गए मुकुटों में धातु के फ्रेम, शीशे के टुकड़े, भारी पत्थर और कई मीटर लंबे कपड़े का उपयोग होता है। एक मुकुट का वजन आसानी से 2 से 5 किलोग्राम या उससे भी अधिक हो सकता है।
  • वेशभूषा का भार: भारी ज़री के काम वाले घाघरे, अंगरखे और धातु के आभूषण (जैसे बाजूबंद, भारी हार, और कुंडल) कलाकार के शरीर पर अतिरिक्त 10 से 15 किलोग्राम का भार डाल देते हैं।

जब कोई कलाकार सिर पर इतना भारी मुकुट रखकर संवाद बोलता है, नृत्य करता है, या तेजी से घूमता है, तो उसका सीधा और सबसे घातक असर उसकी गर्दन की मांसपेशियों और रीढ़ की हड्डी पर पड़ता है।


गर्दन दर्द (Cervical Pain) का शारीरिक और वैज्ञानिक पहलू

मानव शरीर विज्ञान (Anatomy) के अनुसार, हमारी गर्दन या ग्रीवा रीढ़ (Cervical Spine) में 7 छोटी हड्डियां (C1 से C7 तक) होती हैं। एक वयस्क मनुष्य के सिर का औसत वजन लगभग 4.5 से 5 किलोग्राम होता है। हमारी गर्दन की मांसपेशियां (जैसे Trapezius और Sternocleidomastoid) इस वजन को संभालने और सिर को घुमाने के लिए प्राकृतिक रूप से डिज़ाइन की गई हैं।

लेकिन जब किसी कलाकार के सिर पर 4-5 किलो का अतिरिक्त मुकुट रख दिया जाता है, तो गर्दन पर पड़ने वाला भार दोगुना हो जाता है। बायोमैकेनिक्स (Biomechanics) के अनुसार, सिर का गुरुत्वाकर्षण केंद्र (Center of Gravity) बदल जाता है।

  1. मांसपेशियों में अत्यधिक खिंचाव: अतिरिक्त वजन को संतुलित करने के लिए गर्दन और कंधों की मांसपेशियों को लगातार सिकुड़े रहना पड़ता है। भवाई के ऊर्जावान नृत्य के दौरान जब सिर झटके से हिलता है, तो यह खिंचाव और भी खतरनाक हो जाता है।
  2. रीढ़ की हड्डियों पर दबाव: मुकुट का लगातार दबाव सर्वाइकल डिस्क (हड्डियों के बीच की गद्देदार परत) को संकुचित कर देता है। लंबे समय तक ऐसा होने से डिस्क अपनी जगह से खिसक सकती है (Herniated Disc)।
  3. नसों का दबना: गर्दन की मांसपेशियों में सूजन या डिस्क के खिसकने से वहां से गुजरने वाली नसें दबने लगती हैं (Nerve Compression), जिससे भयंकर दर्द उत्पन्न होता है।

मुख्य लक्षण और स्वास्थ्य पर दीर्घकालिक प्रभाव

शुरुआत में कलाकारों को यह दर्द केवल थकान लग सकता है, लेकिन वर्षों तक इसी तरह प्रदर्शन करने से यह एक गंभीर और स्थायी बीमारी बन जाता है। भवाई कलाकारों में आमतौर पर निम्नलिखित लक्षण और समस्याएं देखी जाती हैं:

  • तीव्र और क्रोनिक दर्द: गर्दन से शुरू होकर यह दर्द कंधों और हाथों की उंगलियों तक फैल जाता है।
  • मांसपेशियों में ऐंठन (Muscle Spasms): प्रदर्शन के बाद गर्दन का पूरी तरह से अकड़ जाना, जिससे सिर को बाएँ या दाएँ घुमाना असंभव हो जाता है।
  • सिरदर्द और चक्कर आना: गर्दन की नसों पर दबाव पड़ने के कारण मस्तिष्क तक रक्त का प्रवाह प्रभावित होता है, जिससे कलाकारों को माइग्रेन, चक्कर आना (Vertigo) और आंखों के सामने अंधेरा छाने की शिकायत होती है।
  • हाथों में सुन्नपन (Numbness): सर्वाइकल रेडिकुलोपैथी (Cervical Radiculopathy) के कारण कलाकारों के हाथों में झुनझुनी या सुन्नपन आ जाता है, जिससे उनकी दैनिक दिनचर्या प्रभावित होती है।
  • समय से पहले संन्यास: कई होनहार कलाकार सर्वाइकल स्पॉन्डिलाइटिस (Cervical Spondylitis) के कारण 40-45 वर्ष की आयु में ही अपनी कला को छोड़ने के लिए मजबूर हो जाते हैं।

सामाजिक और आर्थिक मजबूरियां: दर्द क्यों सहते हैं कलाकार?

यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि इतनी पीड़ा के बावजूद कलाकार यह भारी वेशभूषा क्यों पहनते हैं? इसके पीछे गहरी सामाजिक और आर्थिक मजबूरियां हैं।

भवाई मुख्य रूप से ‘नायक’ या ‘भोजक’ समुदाय द्वारा किया जाता है। अधिकांश लोक कलाकारों की आर्थिक स्थिति बहुत मजबूत नहीं होती। उनके लिए भवाई केवल एक कला नहीं, बल्कि आजीविका का मुख्य साधन है। खासकर नवरात्रि और सर्दियों के मेलों के दौरान ही उन्हें सबसे ज्यादा काम मिलता है।

कलाकार मानते हैं कि “शो मस्ट गो ऑन” (Show must go on)। यदि वे मुकुट नहीं पहनेंगे या वेशभूषा हल्की कर देंगे, तो दर्शक निराश होंगे और उन्हें शायद अगली बार प्रदर्शन के लिए न बुलाया जाए। प्रतिस्पर्धा और अपनी कला के प्रति अगाध श्रद्धा उन्हें इस दर्द को मुस्कान के पीछे छिपाने और पेनकिलर (Painkillers) खाकर मंच पर उतरने के लिए विवश करती है। स्वास्थ्य बीमा (Health Insurance) या अच्छी चिकित्सा सुविधाओं का अभाव इस स्थिति को और भी बदतर बना देता है।


इस समस्या के व्यावहारिक समाधान और बचाव के उपाय

भवाई जैसी प्राचीन कला को जीवित रखना आवश्यक है, लेकिन कलाकारों के स्वास्थ्य की कीमत पर नहीं। कुछ व्यावहारिक और आधुनिक उपायों को अपनाकर इस समस्या को काफी हद तक कम किया जा सकता है:

1. हल्की सामग्री (Lightweight Materials) का उपयोग: पारंपरिक पीतल, तांबे और भारी लकड़ी के बजाय आधुनिक सामग्रियों का उपयोग किया जाना चाहिए।

  • मुकुट बनाने के लिए फाइबरग्लास (Fiberglass), पाम-मेशे (Papier-mâché), या 3D प्रिंटेड हल्की प्लास्टिक का उपयोग किया जा सकता है।
  • ये सामग्रियां दिखने में हूबहू पारंपरिक धातु जैसी लगती हैं (मैटेलिक पेंट के कारण) लेकिन इनका वजन पारंपरिक मुकुटों का केवल 10% से 20% होता है।
  • वेशभूषा में भी भारी कैनवास या मखमली कपड़ों के बजाय देखने में भारी लेकिन असल में हल्के सिंथेटिक कपड़ों का प्रयोग किया जा सकता है।

2. एर्गोनोमिक डिज़ाइन (Ergonomic Design): मुकुट का डिज़ाइन ऐसा होना चाहिए कि उसका सारा वजन सिर के बीचों-बीच (Center of the skull) पड़े, न कि माथे या गर्दन के पिछले हिस्से पर। मुकुट के अंदर एक नरम, गद्देदार हेलमेट जैसी संरचना होनी चाहिए जो वजन को समान रूप से सिर पर वितरित करे।

3. फिजियोथेरेपी और व्यायाम: कलाकारों को अपनी गर्दन और पीठ की मांसपेशियों को मजबूत करने के लिए विशेष व्यायाम सिखाए जाने चाहिए। प्रदर्शन से पहले ‘वार्म-अप’ और प्रदर्शन के बाद ‘कूल-डाउन’ स्ट्रेचिंग को दिनचर्या का अनिवार्य हिस्सा बनाना चाहिए।

4. पर्दे के पीछे के नियम: जब कोई कलाकार मंच पर नहीं है या दृश्य के बीच में अंतराल है, तो उन्हें तुरंत अपना भारी मुकुट उतारने की आदत डालनी चाहिए। कुछ ही मिनटों का यह आराम गर्दन की मांसपेशियों को रक्त संचार बहाल करने का मौका देता है।

5. सरकारी और संस्थागत सहायता: सांस्कृतिक मंत्रालयों और गैर-सरकारी संगठनों (NGOs) को आगे आकर लोक कलाकारों के लिए स्वास्थ्य शिविर लगाने चाहिए। उन्हें मुफ्त चिकित्सा जांच, सर्वाइकल कॉलर (Cervical collars), और स्वास्थ्य बीमा प्रदान किया जाना चाहिए ताकि वे बिना आर्थिक चिंता के अपना इलाज करा सकें।


निष्कर्ष

‘भवाई’ गुजरात की मिट्टी की महक और उसकी सांस्कृतिक विरासत का एक अमूल्य हिस्सा है। भवाई के कलाकार हमारे इतिहास और परंपराओं के सच्चे ध्वजवाहक हैं। जब वे मंच पर भारी मुकुट पहनकर राजा या देवता का रूप धारण करते हैं, तो वे केवल अभिनय नहीं कर रहे होते, बल्कि वे हमारी संस्कृति को जीवित रख रहे होते हैं।

कला का सम्मान केवल तालियां बजाकर नहीं, बल्कि कलाकारों की पीड़ा को समझकर और उसे दूर करने के प्रयास से होता है। परंपराओं को संरक्षित करते हुए आधुनिक वैज्ञानिक दृष्टिकोण और हल्की सामग्रियों का समावेश समय की मांग है। यदि समय रहते इन लोक कलाकारों के शारीरिक स्वास्थ्य पर ध्यान नहीं दिया गया, तो भारी मुकुटों के बोझ तले न केवल कलाकारों की रीढ़ टूटेगी, बल्कि हमारी एक बेहद खूबसूरत और जीवंत लोक कला भी हमेशा के लिए खामोश हो जाएगी। हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि जो कलाकार अपने अभिनय से दर्शकों के चेहरे पर मुस्कान लाते हैं, उनका अपना जीवन दर्द और आंसुओं में न बीते।

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