RED-S सिंड्रोम (Relative Energy Deficiency in Sport): महिला एथलीट्स में कम ऊर्जा और बार-बार फ्रैक्चर होने का कारण
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RED-S सिंड्रोम (Relative Energy Deficiency in Sport): महिला एथलीट्स में कम ऊर्जा और बार-बार फ्रैक्चर होने का कारण

खेल और फिटनेस की दुनिया में, एथलीट्स अक्सर अपने प्रदर्शन को चरम पर ले जाने के लिए कड़ी मेहनत करते हैं। वे घंटों पसीना बहाते हैं, कठोर ट्रेनिंग करते हैं और अपनी शारीरिक सीमाओं को चुनौती देते हैं। लेकिन, सफलता और मेडल की इस दौड़ में, कभी-कभी वे एक अदृश्य और खतरनाक स्थिति का शिकार हो जाते हैं जिसे RED-S (Relative Energy Deficiency in Sport) या ‘खेल में सापेक्ष ऊर्जा की कमी’ कहा जाता है।

विशेष रूप से महिला एथलीट्स में यह सिंड्रोम एक गंभीर चिंता का विषय बन गया है। लगातार थकान, प्रदर्शन में गिरावट और सबसे खतरनाक—बार-बार होने वाले स्ट्रेस फ्रैक्चर, इस सिंड्रोम के प्रमुख संकेत हैं। आइए इस लेख के माध्यम से विस्तार से समझते हैं कि RED-S क्या है, यह महिला एथलीट्स को कैसे और क्यों प्रभावित करता है, इसके लक्षण क्या हैं, और इससे कैसे बचा जा सकता है।


RED-S (रेड-एस) क्या है?

RED-S का सीधा सा अर्थ है शरीर में ऊर्जा का असंतुलन। आसान शब्दों में, यह तब होता है जब कोई एथलीट अपनी ट्रेनिंग, अभ्यास और दिनचर्या में जितनी ऊर्जा (कैलोरी) खर्च करता है, उसकी तुलना में वह भोजन के माध्यम से पर्याप्त ऊर्जा ग्रहण नहीं करता है। इस स्थिति को चिकित्सा भाषा में ‘Low Energy Availability’ (LEA) या ‘कम ऊर्जा उपलब्धता’ कहा जाता है।

Female Athlete Triad से RED-S तक का सफर: पहले इस स्थिति को ‘फीमेल एथलीट ट्रायड’ (Female Athlete Triad) के नाम से जाना जाता था, जिसमें तीन मुख्य समस्याएं शामिल थीं—खाने के विकार (Eating Disorders), माहवारी का रुकना (Amenorrhea), और हड्डियों का कमजोर होना (Osteoporosis)। लेकिन वर्ष 2014 में, अंतर्राष्ट्रीय ओलंपिक समिति (IOC) ने इसे एक नया और व्यापक नाम ‘RED-S’ दिया। इसका कारण यह था कि शोध में पाया गया कि ऊर्जा की कमी केवल हड्डियों या प्रजनन प्रणाली को ही नहीं, बल्कि शरीर के हर हिस्से (इम्यूनिटी, चयापचय, हृदय और मानसिक स्वास्थ्य) को प्रभावित करती है। इसके अलावा, हालांकि यह महिलाओं में अधिक देखा जाता है, लेकिन पुरुष एथलीट्स भी इसका शिकार हो सकते हैं।


शरीर में ऊर्जा की कमी (Low Energy Availability) कैसे होती है?

जब शरीर को पर्याप्त ईंधन (भोजन) नहीं मिलता है, तो वह ‘सर्वाइवल मोड’ (जीवित रहने की स्थिति) में चला जाता है। शरीर यह समझता है कि उसे अकाल जैसी स्थिति का सामना करना पड़ रहा है, इसलिए वह ऊर्जा बचाने के लिए उन शारीरिक प्रक्रियाओं को बंद या धीमा कर देता है जो तत्काल जीवित रहने के लिए आवश्यक नहीं हैं। इनमें प्रजनन प्रणाली (Reproductive system), हड्डियों का निर्माण और चयापचय (Metabolism) शामिल हैं।

एथलीट्स में ऊर्जा की कमी के दो मुख्य कारण हो सकते हैं:

  1. अनजाने में कम खाना: कई बार एथलीट्स को यह अंदाज़ा ही नहीं होता कि उनकी कठोर ट्रेनिंग के लिए उन्हें कितनी अतिरिक्त कैलोरी की आवश्यकता है।
  2. जानबूझकर कम खाना: कुछ खेलों में वजन या शरीर के आकार को लेकर बहुत दबाव होता है (जैसे- जिम्नास्टिक्स, फिगर स्केटिंग, मैराथन रनिंग)। वजन कम रखने की चाह में एथलीट्स जानबूझकर डाइटिंग करते हैं या खाना छोड़ देते हैं, जो ईटिंग डिसऑर्डर (जैसे एनोरेक्सिया) का रूप ले लेता है।

महिला एथलीट्स में बार-बार फ्रैक्चर होने का मुख्य कारण

RED-S का सबसे गंभीर और दर्दनाक परिणाम है—हड्डियों का कमजोर होना और बार-बार स्ट्रेस फ्रैक्चर होना। महिला एथलीट्स में इसका एक विशेष वैज्ञानिक कारण है जो सीधे उनके हार्मोनल संतुलन से जुड़ा है:

1. एस्ट्रोजन हार्मोन की कमी: जब एक महिला एथलीट पर्याप्त ऊर्जा नहीं लेती है, तो उसका शरीर ऊर्जा बचाने के लिए प्रजनन प्रणाली को अस्थायी रूप से बंद कर देता है। इसके परिणामस्वरूप मासिक धर्म (Periods) अनियमित हो जाते हैं या पूरी तरह से रुक जाते हैं। इस स्थिति को एमेनोरिया (Amenorrhea) कहते हैं। माहवारी रुकने का सीधा मतलब है कि अंडाशय (Ovaries) पर्याप्त मात्रा में एस्ट्रोजन (Estrogen) हार्मोन का उत्पादन नहीं कर रहे हैं।

2. एस्ट्रोजन और हड्डियों का कनेक्शन: एस्ट्रोजन हार्मोन महिलाओं में हड्डियों के स्वास्थ्य और मजबूती (Bone Mineral Density) को बनाए रखने के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। यह हड्डियों में कैल्शियम को सोखने और नई हड्डी के निर्माण में मदद करता है। जब शरीर में एस्ट्रोजन का स्तर गिर जाता है, तो हड्डियों का घनत्व तेजी से कम होने लगता है और वे भुरभुरी और कमजोर हो जाती हैं (ऑस्टियोपोरोसिस)।

3. स्ट्रेस फ्रैक्चर (Stress Fractures): एक तरफ एथलीट की हड्डियां कमजोर हो रही होती हैं, और दूसरी तरफ वह लगातार दौड़ने, कूदने या भारी वजन उठाने जैसी कठोर ट्रेनिंग कर रही होती है। कमजोर हड्डियों पर पड़ने वाले इस लगातार दबाव (Stress) के कारण हड्डियों में दरारें आ जाती हैं, जिन्हें स्ट्रेस फ्रैक्चर कहा जाता है। ये अक्सर पैरों, टखनों, जांघ की हड्डी या पेल्विस में होते हैं। यदि कोई युवा महिला एथलीट बार-बार फ्रैक्चर का शिकार हो रही है, तो यह RED-S का सबसे बड़ा ‘रेड फ्लैग’ (चेतावनी) है।


RED-S के प्रमुख लक्षण और संकेत

RED-S को पहचानना हमेशा आसान नहीं होता क्योंकि एथलीट्स अक्सर अपनी थकान को सामान्य ट्रेनिंग का हिस्सा मान लेते हैं। कोच, माता-पिता और स्वयं एथलीट्स को निम्नलिखित लक्षणों पर नज़र रखनी चाहिए:

शारीरिक लक्षण:

  • माहवारी में गड़बड़ी: पीरियड्स का देर से आना, अनियमित होना, या लगातार 3 महीने या उससे अधिक समय तक न आना।
  • लगातार थकान: भरपूर नींद लेने के बाद भी थका हुआ महसूस करना।
  • बार-बार चोटें: विशेष रूप से स्ट्रेस फ्रैक्चर और मांसपेशियों में खिंचाव।
  • वजन में असामान्य कमी: या शरीर के वजन को बनाए रखने में कठिनाई।
  • कमजोर इम्यूनिटी: बार-बार सर्दी, खांसी या वायरल इन्फेक्शन होना।
  • पाचन संबंधी समस्याएं: कब्ज, सूजन या पेट दर्द।
  • हृदय गति: आराम के समय हृदय गति (Resting Heart Rate) का असामान्य रूप से कम होना।

मनोवैज्ञानिक लक्षण:

  • खेल या ट्रेनिंग के प्रति प्रेरणा (Motivation) में कमी।
  • चिड़चिड़ापन, एंग्जायटी (घबराहट) या डिप्रेशन।
  • शरीर के आकार और वजन को लेकर अत्यधिक चिंता करना।
  • भोजन को लेकर असामान्य व्यवहार (जैसे दूसरों के सामने न खाना)।

प्रदर्शन संबंधी लक्षण:

  • ट्रेनिंग के बावजूद खेल के प्रदर्शन में गिरावट।
  • वर्कआउट के बाद रिकवरी में सामान्य से बहुत अधिक समय लगना।
  • मांसपेशियों की ताकत और सहनशक्ति (Endurance) में कमी।

RED-S का शरीर के अन्य तंत्रों पर प्रभाव

अंतर्राष्ट्रीय ओलंपिक समिति के अनुसार, RED-S का प्रभाव केवल हड्डियों और प्रजनन तंत्र तक सीमित नहीं है। यह शरीर के लगभग हर सिस्टम को नुकसान पहुंचाता है:

  1. चयापचय (Metabolism): शरीर का मेटाबॉलिक रेट धीमा हो जाता है, जिससे ऊर्जा उत्पादन कम हो जाता है।
  2. हृदय स्वास्थ्य (Cardiovascular Health): हार्मोनल असंतुलन के कारण रक्त वाहिकाओं की कार्यप्रणाली प्रभावित होती है, जिससे भविष्य में हृदय रोगों का खतरा बढ़ सकता है।
  3. मानसिक स्वास्थ्य (Psychological Health): ऊर्जा की कमी मस्तिष्क के रसायनों को प्रभावित करती है, जिससे एकाग्रता में कमी और मनोवैज्ञानिक तनाव बढ़ता है।
  4. प्रोटीन सिंथेसिस (Protein Synthesis): कम ऊर्जा के कारण शरीर मांसपेशियों की मरम्मत और निर्माण नहीं कर पाता है, जिससे मांसपेशियों का नुकसान होता है।

RED-S का निदान और उपचार

RED-S का उपचार कोई एक डॉक्टर अकेले नहीं कर सकता। इसके लिए एक बहु-विषयी दृष्टिकोण (Multidisciplinary Approach) की आवश्यकता होती है।

निदान (Diagnosis): स्पोर्ट्स मेडिसिन डॉक्टर आमतौर पर एथलीट की मेडिकल हिस्ट्री, खाने की आदतों और ट्रेनिंग रूटीन की जांच करते हैं। इसमें रक्त परीक्षण (हार्मोन और विटामिन के स्तर की जांच के लिए) और हड्डियों के घनत्व की जांच के लिए DEXA स्कैन (Dual-Energy X-ray Absorptiometry) शामिल हो सकता है।

उपचार की प्रक्रिया:

  1. पोषण में सुधार (Nutritional Intervention): एक योग्य स्पोर्ट्स डायटीशियन एथलीट के लिए एक नया डाइट प्लान बनाता है। मुख्य लक्ष्य कैलोरी का सेवन बढ़ाना होता है ताकि ‘ऊर्जा की कमी’ को पाटा जा सके। कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन और स्वस्थ वसा का सही संतुलन बहुत जरूरी है। कैल्शियम और विटामिन डी के सप्लीमेंट्स भी हड्डियों की रिकवरी के लिए दिए जाते हैं।
  2. ट्रेनिंग में बदलाव (Modifying Training Load): रिकवरी के दौरान एथलीट को अपनी ट्रेनिंग की तीव्रता और अवधि कम करनी पड़ती है। गंभीर मामलों में, कुछ समय के लिए ट्रेनिंग पूरी तरह से रोकनी भी पड़ सकती है जब तक कि शरीर स्वस्थ न हो जाए।
  3. मनोवैज्ञानिक सहायता (Psychological Support): यदि एथलीट ईटिंग डिसऑर्डर (भोजन संबंधी विकार) या शरीर की छवि (Body Image) को लेकर तनाव से पीड़ित है, तो एक स्पोर्ट्स साइकोलॉजिस्ट या थेरेपिस्ट की मदद लेना अनिवार्य है।
  4. मेडिकल मॉनिटरिंग: डॉक्टर लगातार एथलीट के हार्मोन लेवल, मासिक धर्म की वापसी और हड्डियों के स्वास्थ्य की निगरानी करते हैं।

ध्यान दें: महिलाओं में हड्डियों का अधिकतम घनत्व (Peak Bone Mass) 20 से 25 वर्ष की आयु तक बनता है। यदि इस उम्र में RED-S के कारण हड्डियों का नुकसान होता है, तो भविष्य में उसकी भरपाई करना लगभग असंभव हो जाता है।


रोकथाम (Prevention) – बचाव ही सबसे अच्छा उपाय है

RED-S को रोकने के लिए खेल संस्कृति में एक बड़ा बदलाव लाने की जरूरत है। इसके लिए कोच, खेल संगठनों और परिवार को मिलकर काम करना होगा:

  • जागरूकता फैलाना: एथलीट्स और कोच को पोषण और ऊर्जा की आवश्यकताओं के बारे में शिक्षित करना। यह समझना जरूरी है कि ‘पतला होना’ हमेशा ‘स्वस्थ और तेज होने’ की गारंटी नहीं है।
  • वजन के दबाव को कम करना: खेलों में वजन तौलने और शरीर के आकार पर होने वाली अनावश्यक टिप्पणियों को रोकना चाहिए। फोकस एथलीट के स्वास्थ्य और ताकत पर होना चाहिए, न कि केवल तराजू के कांटे पर।
  • खुलकर बात करना: महिला एथलीट्स को अपनी मासिक धर्म के स्वास्थ्य के बारे में अपने कोच या मेडिकल स्टाफ से बेझिझक बात करने के लिए सुरक्षित माहौल देना चाहिए। माहवारी का रुकना सामान्य नहीं है, यह एक मेडिकल इमरजेंसी का संकेत है।
  • नियमित स्वास्थ्य जांच: एथलीट्स की नियमित रूप से स्क्रीनिंग होनी चाहिए ताकि ऊर्जा की कमी के शुरुआती संकेतों को समय रहते पकड़ा जा सके।

निष्कर्ष

RED-S (Relative Energy Deficiency in Sport) महिला एथलीट्स के करियर और जीवन दोनों के लिए एक मूक हत्यारा साबित हो सकता है। मेडल जीतने की चाह में अक्सर स्वास्थ्य की बलि चढ़ा दी जाती है, जिसका परिणाम बार-बार होने वाले स्ट्रेस फ्रैक्चर, थकावट और डिप्रेशन के रूप में सामने आता है।

हमें यह समझने की जरूरत है कि एक एथलीट का शरीर एक मशीन की तरह है; यदि आप इसमें सही और पर्याप्त मात्रा में ईंधन (पोषण) नहीं डालेंगे, तो यह अंततः टूट जाएगा। खेल की दुनिया में सच्ची सफलता तभी हासिल की जा सकती है जब शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को सर्वोपरि रखा जाए। एक स्वस्थ, ऊर्जावान और मजबूत एथलीट ही लंबे समय तक अपने खेल में उत्कृष्टता प्राप्त कर सकता है।

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