रिटेन्ड प्रिमिटिव रिफ्लेक्सेस (Retained Primitive Reflexes): जब बचपन के रिफ्लेक्स बड़े होने पर भी पोस्चर बिगाड़ते रहें
क्या आपने कभी ऐसे बच्चों या वयस्कों को देखा है जो सीधे नहीं बैठ पाते, हमेशा अपनी डेस्क पर झुके रहते हैं, चलते समय जिनके पैर अंदर या बाहर की तरफ मुड़ते हैं, या जो बार-बार अपनी कुर्सी पर बेचैन होकर हिलते-डुलते रहते हैं? अक्सर हम इसे उनकी ‘आलस’ या ‘खराब आदत’ मानकर उन्हें सीधे बैठने के लिए डांटते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि इसके पीछे कोई खराब आदत नहीं, बल्कि एक न्यूरोलॉजिकल (स्नायुतंत्र संबंधी) कारण हो सकता है? इसे चिकित्सा विज्ञान की भाषा में ‘रिटेन्ड प्रिमिटिव रिफ्लेक्सेस’ (Retained Primitive Reflexes) कहा जाता है।
यह लेख इस बात पर गहराई से प्रकाश डालेगा कि प्रिमिटिव रिफ्लेक्सेस क्या होते हैं, ये बड़े होने पर भी क्यों रह जाते हैं, और कैसे ये हमारे शरीर की मुद्रा (Posture), चाल-ढाल और समग्र स्वास्थ्य को प्रभावित करते हैं।
प्रिमिटिव रिफ्लेक्सेस (Primitive Reflexes) क्या हैं?
जब एक शिशु मां के गर्भ में होता है और जब वह जन्म लेता है, तो उसका मस्तिष्क पूरी तरह से विकसित नहीं होता है। उस समय शिशु के जीवित रहने, जन्म की प्रक्रिया से गुजरने और बाहरी दुनिया के अनुकूल होने के लिए प्रकृति ने उसे कुछ जन्मजात, स्वचालित (automatic) हलचलें या प्रतिक्रियाएं दी हैं। इन्हीं स्वचालित प्रतिक्रियाओं को प्रिमिटिव रिफ्लेक्सेस कहा जाता है।
उदाहरण के लिए, जब आप किसी नवजात शिशु के गाल को छूते हैं, तो वह अपना सिर उसी दिशा में घुमाकर दूध पीने की कोशिश करता है (रूटिंग रिफ्लेक्स)। या जब उसे अचानक कोई तेज आवाज सुनाई देती है, तो वह अपने दोनों हाथ बाहर की तरफ फैला लेता है (मोरो रिफ्लेक्स)। ये रिफ्लेक्स शिशु के जीवित रहने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण होते हैं। ये ब्रेनस्टेम (मस्तिष्क के निचले हिस्से) द्वारा नियंत्रित होते हैं।
“रिटेन्ड” (Retained) होने का क्या अर्थ है?
एक स्वस्थ और सामान्य विकास प्रक्रिया में, जैसे-जैसे शिशु बड़ा होता है (आमतौर पर पहले 12 महीनों के भीतर), उसका उच्च मस्तिष्क (Higher Brain या कॉर्टेक्स) विकसित होने लगता है। मस्तिष्क के इस विकास के साथ, ये शुरुआती प्रिमिटिव रिफ्लेक्सेस धीरे-धीरे अपने आप दब जाते हैं या “इंटीग्रेट” (Integrate) हो जाते हैं। इनकी जगह जीवन भर साथ रहने वाले अधिक उन्नत ‘पोस्चरल रिफ्लेक्सेस’ (Postural Reflexes) ले लेते हैं, जो हमें गुरुत्वाकर्षण के खिलाफ सीधे खड़े होने, चलने और संतुलन बनाए रखने में मदद करते हैं।
लेकिन, यदि किसी कारणवश मस्तिष्क का विकास सही क्रम में न हो, तो ये प्रिमिटिव रिफ्लेक्सेस बचपन के बाद भी बने रह जाते हैं। जब ये रिफ्लेक्स 1 साल की उम्र के बाद भी सक्रिय रहते हैं, तो इन्हें ‘रिटेन्ड प्रिमिटिव रिफ्लेक्सेस’ कहा जाता है।
जब ये रिफ्लेक्सेस बने रहते हैं, तो ये उच्च स्तरीय मस्तिष्क के कार्यों में बाधा डालते हैं। इसके कारण न केवल शारीरिक पोस्चर खराब होता है, बल्कि सीखने, व्यवहार, और भावनाओं को नियंत्रित करने में भी गंभीर समस्याएं आती हैं।
प्रमुख प्रिमिटिव रिफ्लेक्सेस और उनका पोस्चर (मुद्रा) पर प्रभाव
यदि हम यह समझना चाहते हैं कि ये रिफ्लेक्सेस पोस्चर को कैसे बिगाड़ते हैं, तो हमें कुछ प्रमुख रिफ्लेक्सेस को विस्तार से समझना होगा:
1. टोनिक लेबिरिंथाइन रिफ्लेक्स (Tonic Labyrinthine Reflex – TLR)
यह रिफ्लेक्स शिशु को गुरुत्वाकर्षण के साथ तालमेल बिठाने और सिर का नियंत्रण सीखने में मदद करता है। जब शिशु का सिर पीछे झुकता है, तो उसके हाथ-पैर सीधे हो जाते हैं, और जब सिर आगे झुकता है, तो हाथ-पैर मुड़ जाते हैं। इसे 3 से 4 महीने की उम्र तक खत्म हो जाना चाहिए।
रिटेन होने पर पोस्चर पर प्रभाव: यदि यह रिफ्लेक्स बड़े होने पर भी बना रहता है, तो व्यक्ति का अपनी गर्दन और सिर के वजन पर नियंत्रण कमजोर होता है।
- खराब पोस्चर: ऐसे लोग अक्सर अपनी पीठ को झुकाकर (slouched posture) चलते या बैठते हैं। उनके कंधे आगे की ओर झुके होते हैं।
- टो-वॉकिंग (पंजों पर चलना): शरीर का संतुलन बिगड़ने के कारण ऐसे बच्चे अक्सर अपने पंजों के बल चलते हैं।
- मांसपेशियों का ढीलापन: इनकी मांसपेशियों में हमेशा एक कमजोरी (Low muscle tone) सी महसूस होती है। डेस्क पर काम करते समय ये अक्सर अपने सिर को हाथों का सहारा देकर बैठते हैं।
2. असिमेट्रिकल टोनिक नेक रिफ्लेक्स (Asymmetrical Tonic Neck Reflex – ATNR)
इसे “फेंसिंग पोस्चर” (तलवारबाजी की मुद्रा) भी कहा जाता है। जब शिशु अपनी पीठ के बल लेटा होता है और उसका सिर एक तरफ घुमाया जाता है, तो उस तरफ का हाथ और पैर सीधा हो जाता है, जबकि दूसरी तरफ का हाथ और पैर मुड़ जाता है। यह रिफ्लेक्स जन्म के दौरान बच्चे को गर्भ से बाहर आने में मदद करता है और आंखों-हाथों के समन्वय (hand-eye coordination) की नींव रखता है। इसे 6 महीने तक इंटीग्रेट हो जाना चाहिए।
रिटेन होने पर पोस्चर पर प्रभाव:
- रीढ़ की हड्डी का टेढ़ापन (Scoliosis): यदि ATNR बना रहे, तो शरीर का एक हिस्सा दूसरे हिस्से की तुलना में अलग व्यवहार करता है। जब बच्चा लिखते समय अपने सिर को घुमाता है, तो उसका हाथ अनियंत्रित रूप से सीधा होना चाहता है। इस तनाव को रोकने के लिए बच्चा बहुत अजीब मुद्रा में बैठता है, जिससे रीढ़ की हड्डी टेढ़ी (स्कोलियोसिस) होने का खतरा बढ़ जाता है।
- चलने में असंतुलन: चलते समय हाथों और पैरों का स्वाभाविक स्विंग (swing) नहीं हो पाता। चाल रोबोटिक या अजीब लग सकती है।
- लिखने में परेशानी: डेस्क पर लिखते समय पोस्चर बुरी तरह बिगड़ जाता है। बच्चा अपनी कॉपी को बहुत ज्यादा टेढ़ा करके लिखता है ताकि सिर न घुमाना पड़े।
3. सिमेट्रिकल टोनिक नेक रिफ्लेक्स (Symmetrical Tonic Neck Reflex – STNR)
यह रिफ्लेक्स बच्चे को फर्श से उठकर घुटनों के बल रेंगने (Crawling) के लिए तैयार करता है। जब बच्चा सिर ऊपर उठाता है, तो उसके हाथ सीधे हो जाते हैं और पैर मुड़ जाते हैं। जब सिर नीचे करता है, तो हाथ मुड़ जाते हैं और पैर सीधे हो जाते हैं। यह 9 से 11 महीने में इंटीग्रेट हो जाता है।
रिटेन होने पर पोस्चर पर प्रभाव: यह रिफ्लेक्स स्कूल जाने वाले बच्चों के पोस्चर का सबसे बड़ा दुश्मन है।
- कुर्सी पर झुककर बैठना: जब बच्चा डेस्क पर पढ़ने के लिए अपना सिर नीचे झुकाता है, तो उसका शरीर स्वचालित रूप से उसके हाथों को मोड़ने और पैरों को सीधा करने की कोशिश करता है। इसके कारण बच्चा डेस्क पर पूरी तरह से लेट जाता है या कुर्सी से फिसलने लगता है।
- ‘W’ सिटिंग (‘W’ Sitting): फर्श पर बैठते समय ऐसे बच्चे अपने पैरों को मोड़कर ‘W’ के आकार में बैठते हैं। यह मुद्रा उनके कूल्हों और घुटनों के लिए बहुत हानिकारक होती है।
- बंदर जैसी चाल: चलते समय इनका पोस्चर आगे की तरफ झुका हुआ (Ape-like walk) हो सकता है।
4. स्पाइनल गैलेंट रिफ्लेक्स (Spinal Galant Reflex)
यह रिफ्लेक्स बच्चे के जन्म के समय श्रोणि (pelvis) को घुमाकर बर्थ कैनाल से नीचे आने में मदद करता है। यदि शिशु की पीठ के एक तरफ रीढ़ की हड्डी के समानांतर उंगली फेरी जाए, तो उसका कूल्हा उसी तरफ मुड़ जाता है। इसे 3 से 9 महीने में खत्म हो जाना चाहिए।
रिटेन होने पर पोस्चर पर प्रभाव:
- लगातार हिलना-डुलना (Fidgeting): यदि कुर्सी का किनारा या कपड़े (जैसे तंग बेल्ट या टैग) बच्चे की पीठ को छूते हैं, तो यह रिफ्लेक्स ट्रिगर हो जाता है। इसके कारण बच्चा एक जगह शांति से नहीं बैठ पाता और कुर्सी पर लगातार हिलता रहता है (Ants in the pants)।
- मुद्रा में असंतुलन: इससे भी स्कोलियोसिस (रीढ़ की हड्डी का घुमाव) विकसित होने का जोखिम रहता है क्योंकि शरीर का एक हिस्सा लगातार मुड़ने की कोशिश करता है। चलने की शैली में एक तरफ कूल्हे का असामान्य उठाव दिख सकता है।
5. मोरो रिफ्लेक्स (Moro Reflex)
यह शिशु का “स्टार्टल” या डर का रिफ्लेक्स है। अचानक आवाज या हलचल होने पर शिशु घबराकर हाथ-पैर फैला लेता है, सांस अंदर खींचता है और फिर रोने लगता है।
रिटेन होने पर पोस्चर पर प्रभाव: हालांकि मोरो रिफ्लेक्स का सीधा संबंध पोस्चर से नहीं लगता, लेकिन यह पूरे शरीर के ‘फाइट या फ्लाइट’ (Fight or Flight) तंत्र को चालू रखता है।
- मांसपेशियों में अत्यधिक तनाव: ऐसे लोगों के कंधे हमेशा तने हुए और कानों की तरफ उठे हुए होते हैं। उनकी गर्दन और पीठ के ऊपरी हिस्से में हमेशा जकड़न (stiffness) रहती है।
- थकावट भरा पोस्चर: लगातार तनाव में रहने के कारण शरीर जल्दी थक जाता है, जिससे क्रोनिक थकान और ढीला पोस्चर जीवन का हिस्सा बन जाता है।
ये रिफ्लेक्सेस रिटेन क्यों रह जाते हैं? (Causes of Retention)
आखिर क्यों कुछ बच्चों में ये रिफ्लेक्सेस स्वाभाविक रूप से खत्म नहीं हो पाते? इसके पीछे कई कारण हो सकते हैं:
- गर्भावस्था और जन्म की जटिलताएं: समय से पहले जन्म (Premature birth), कम वजन, या सिजेरियन डिलीवरी (C-section)। जन्म प्रक्रिया के दौरान संकुचन (contractions) रिफ्लेक्सेस को इंटीग्रेट करने में मदद करते हैं, जो सी-सेक्शन में मिस हो जाते हैं।
- शारीरिक गतिविधिकी की कमी: आज के आधुनिक जीवन में शिशुओं को घुमाने के लिए बहुत सारे उपकरण (कार सीट, स्ट्रोलर, बेबी वॉकर, बाउंसर) मौजूद हैं। इनमें बच्चा लंबे समय तक एक ही स्थिति में बंधा रहता है। “टमी टाइम” (पेट के बल लेटना) और स्वतंत्र रूप से फर्श पर रेंगने (crawling) के पर्याप्त अवसर न मिलने से रिफ्लेक्स इंटीग्रेट नहीं हो पाते।
- बीमारियां या ट्रॉमा: बचपन में बार-बार कान में संक्रमण (Ear infections) संतुलन तंत्र को प्रभावित कर सकता है। इसके अलावा कोई सिर की चोट या भारी मानसिक आघात भी पहले से दबे हुए रिफ्लेक्सेस को दोबारा सक्रिय कर सकता है।
- पर्यावरणीय विषाक्त पदार्थ: गर्भावस्था के दौरान या जन्म के बाद भारी धातुओं, रसायनों या अत्यधिक तनाव का प्रभाव भी स्नायुतंत्र के विकास में बाधा डाल सकता है।
खराब पोस्चर के अलावा अन्य लक्षण
जब प्रिमिटिव रिफ्लेक्सेस रिटेन रहते हैं, तो समस्या सिर्फ खराब शारीरिक मुद्रा तक सीमित नहीं रहती। यह बच्चे या वयस्क के संपूर्ण जीवन को प्रभावित करती है:
- एकाग्रता में कमी और ADHD: हिलने-डुलने और असहज पोस्चर के कारण बच्चा पढ़ाई पर ध्यान केंद्रित नहीं कर पाता। अक्सर ऐसे बच्चों को गलती से ADHD (अटेंशन डेफिसिट हाइपरएक्टिविटी डिसऑर्डर) का मरीज मान लिया जाता है।
- पढ़ने और लिखने में समस्या (Dyslexia/Dysgraphia): आंखों के समन्वय में कमी के कारण अक्षरों को पहचानने, लाइन पर लिखने और ब्लैकबोर्ड से कॉपी करने में भारी दिक्कत होती है।
- भावनात्मक अस्थिरता: मोरो रिफ्लेक्स के कारण व्यक्ति हमेशा एंग्जायटी (घबराहट), डर, और मूड स्विंग्स का शिकार रहता है।
- संवेदी मुद्दे (Sensory Processing Issues): रोशनी, आवाज या स्पर्श के प्रति अत्यधिक संवेदनशीलता (Hypersensitivity)।
निदान (Diagnosis) और उपचार: क्या किया जा सकता है?
अच्छी खबर यह है कि न्यूरोप्लास्टिसिटी (मस्तिष्क की खुद को बदलने और ढालने की क्षमता) के कारण किसी भी उम्र में इन रिफ्लेक्सेस को इंटीग्रेट किया जा सकता है।
जांच कौन करता है? ऑक्यूपेशनल थेरेपिस्ट (Occupational Therapists), पीडियाट्रिक न्यूरोलॉजिस्ट, या न्यूरो-डेवलपमेंटल विशेषज्ञ इसकी जांच करते हैं। वे कुछ आसान शारीरिक परीक्षणों के माध्यम से पता लगा सकते हैं कि कौन सा रिफ्लेक्स अभी भी सक्रिय है।
उपचार: रिफ्लेक्स इंटीग्रेशन थेरेपी (Reflex Integration Therapy) इसके उपचार में किसी दवा की आवश्यकता नहीं होती। इसमें एक विशेष प्रकार की व्यायाम योजना (Exercise program) का पालन किया जाता है:
- न्यूरोलॉजिकल मूवमेंट पैटर्न: इसमें व्यक्ति को बचपन के उन मूवमेंट्स को दोबारा से और सही तरीके से दोहराने को कहा जाता है, जो वह बचपन में नहीं कर पाया था।
- रेंगने वाले व्यायाम (Crawling Exercises): पेट के बल और घुटनों के बल रेंगने के व्यायाम STNR और ATNR को खत्म करने में चमत्कारिक रूप से काम करते हैं।
- रिदमिक मूवमेंट ट्रेनिंग (Rhythmic Movement Training – RMT): इसमें कोमल, लयबद्ध हलचलें शामिल होती हैं जो नवजात शिशु द्वारा गर्भ में या जन्म के बाद किए जाने वाले प्राकृतिक मूवमेंट्स की नकल करती हैं।
- नियमित अभ्यास: ये व्यायाम प्रतिदिन 10 से 15 मिनट के लिए कम से कम 6 से 12 महीने तक लगातार करने होते हैं। जैसे-जैसे ये व्यायाम स्नायुतंत्र को परिपक्व करते हैं, रिफ्लेक्सेस अपने आप दब जाते हैं।
निष्कर्ष
खराब पोस्चर, हर समय झुककर बैठना, या अनाड़ीपन (clumsiness) हमेशा खराब आदतों का परिणाम नहीं होते हैं। यदि आपको या आपके बच्चे को बार-बार टोकने के बावजूद मुद्रा (posture) में कोई सुधार नहीं आ रहा है, तो इसके पीछे रिटेन्ड प्रिमिटिव रिफ्लेक्सेस एक बड़ा कारण हो सकते हैं।
शरीर को जबरदस्ती सीधा रखने के लिए कहने या महंगे पोस्चर करेक्टर बेल्ट पहनने से मूल समस्या हल नहीं होती। मूल समस्या हमारे स्नायुतंत्र (Nervous System) की नींव में छिपी है। सही जानकारी, विशेषज्ञ की पहचान और लक्षित ‘रिफ्लेक्स इंटीग्रेशन’ व्यायामों के माध्यम से हम अपने मस्तिष्क को फिर से प्रशिक्षित कर सकते हैं। जब ये बचपन के रिफ्लेक्सेस सही तरीके से इंटीग्रेट हो जाते हैं, तो न केवल पोस्चर में चमत्कारिक सुधार आता है, बल्कि आत्मविश्वास, एकाग्रता और शारीरिक ऊर्जा के स्तर में भी एक नई जान आ जाती है। जीवन में कभी भी इन रिफ्लेक्सेस को ठीक करने में देर नहीं होती!
