ऑपरेशन थियेटर में फिजियो बड़ी सर्जरी से तुरंत पहले और बाद में (Perioperative) फिजियोथेरेपिस्ट की भूमिका।
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ऑपरेशन थियेटर और पेरिऑपरेटिव केयर में फिजियोथेरेपिस्ट की महत्वपूर्ण भूमिका

जब भी हम किसी बड़ी सर्जरी (Major Surgery) के बारे में सोचते हैं, तो हमारे दिमाग में सबसे पहले सर्जन, एनेस्थेटिस्ट और नर्सों की तस्वीर उभरती है। लेकिन आधुनिक चिकित्सा विज्ञान में एक सफल सर्जरी केवल ऑपरेशन थियेटर (OT) की टेबल तक सीमित नहीं होती। मरीज के जल्दी और सुरक्षित रूप से ठीक होने में एक और विशेषज्ञ की भूमिका बेहद अहम होती है—और वह है फिजियोथेरेपिस्ट (Physiotherapist)

बड़ी सर्जरियों, जैसे कार्डियक (बायपास), न्यूरोलॉजिकल, ऑर्थोपेडिक या पेट की गंभीर सर्जरियों में, ऑपरेशन से ठीक पहले, ऑपरेशन के दौरान और उसके तुरंत बाद की अवधि को पेरिऑपरेटिव अवधि (Perioperative Period) कहा जाता है। इस पूरे चरण में फिजियोथेरेपिस्ट का हस्तक्षेप न केवल रिकवरी को तेज करता है, बल्कि कई जानलेवा जटिलताओं को भी रोकता है।

आइए विस्तार से समझते हैं कि एक बड़ी सर्जरी के पेरिऑपरेटिव चरण (ऑपरेशन से पहले और तुरंत बाद) और ऑपरेशन थियेटर के भीतर एक फिजियोथेरेपिस्ट क्या भूमिका निभाता है।

Table of Contents

1. पेरिऑपरेटिव फिजियोथेरेपी क्या है?

पेरिऑपरेटिव फिजियोथेरेपी एक विशेष क्लिनिकल दृष्टिकोण है जिसका उद्देश्य सर्जरी के शारीरिक और मानसिक झटके (Trauma) के लिए मरीज को तैयार करना और सर्जरी के बाद शरीर की सामान्य कार्यप्रणाली को जल्द से जल्द बहाल करना है।

बड़ी सर्जरी के दौरान शरीर भारी तनाव से गुजरता है। एनेस्थीसिया (Anesthesia) के प्रभाव, लंबे समय तक एक ही स्थिति में लेटे रहने और चीरे (Incision) के दर्द के कारण श्वसन तंत्र (Respiratory system), हृदय और मांसपेशियों की कार्यक्षमता बुरी तरह प्रभावित होती है। फिजियोथेरेपिस्ट इन्हीं जोखिमों को कम करने का काम करते हैं।

2. सर्जरी से तुरंत पहले (Pre-operative Phase) की भूमिका

सर्जरी से कुछ घंटे या एक दिन पहले, मरीज शारीरिक और मानसिक रूप से बहुत कमजोर या डरा हुआ हो सकता है। इस समय फिजियोथेरेपिस्ट की भूमिका मरीज को “सर्जरी के बाद की चुनौतियों” के लिए तैयार करने की होती है।

बेसलाइन मूल्यांकन (Baseline Assessment)

सर्जरी से पहले, फिजियोथेरेपिस्ट मरीज की वर्तमान शारीरिक क्षमता, फेफड़ों की ताकत (Lung capacity), और जोड़ों की गतिशीलता (Range of Motion) का आकलन करते हैं। यह असेसमेंट इसलिए जरूरी है ताकि सर्जरी के बाद रिकवरी का लक्ष्य निर्धारित किया जा सके।

श्वसन तंत्र की तैयारी (Respiratory Preparation)

जनरल एनेस्थीसिया के कारण सर्जरी के बाद फेफड़ों की कार्यक्षमता कम हो जाती है। फिजियोथेरेपिस्ट मरीज को इंसेंटिव स्पायरोमेट्री (Incentive Spirometry) का उपयोग करना सिखाते हैं।

  • ब्रीदिंग एक्सरसाइज (Breathing Exercises): मरीज को गहरी सांस लेने (Deep breathing) और डायाफ्रामिक ब्रीदिंग (Diaphragmatic breathing) की तकनीकें सिखाई जाती हैं।
  • खांसने की सही तकनीक (Supported Coughing): पेट या छाती की सर्जरी के बाद खांसना बहुत दर्दनाक होता है। फिजियोथेरेपिस्ट मरीज को तकिये या हाथों के सहारे (Splinting) खांसने का सही तरीका सिखाते हैं, ताकि टांकों पर जोर न पड़े और फेफड़ों से बलगम (Sputum) आसानी से बाहर आ सके।

शिक्षा और काउंसलिंग (Patient Education)

मरीज को यह बताना कि सर्जरी के बाद उसे दर्द के बावजूद चलना होगा, उसे मानसिक रूप से मजबूत बनाता है। जब मरीज को पहले से पता होता है कि आईसीयू (ICU) या रिकवरी रूम में उसके साथ क्या होने वाला है, तो उसका तनाव (Anxiety) काफी हद तक कम हो जाता है।

3. ऑपरेशन थियेटर (OT) के अंदर फिजियोथेरेपिस्ट की भूमिका

आमतौर पर यह माना जाता है कि फिजियोथेरेपिस्ट का काम ओटी (OT) के बाहर होता है, लेकिन जटिल सर्जरियों में ऑपरेशन थियेटर के अंदर भी उनकी भूमिका बहुत विशिष्ट और महत्वपूर्ण होती है:

अ. पोज़िशनिंग और नसों का बचाव (Patient Positioning)

बड़ी सर्जरियां 6 से 10 घंटे तक चल सकती हैं। एनेस्थीसिया के प्रभाव में मरीज अपने शरीर का दर्द महसूस नहीं कर सकता।

  • लंबे समय तक गलत पोजीशन में लेटे रहने से मरीज को प्रेशर अल्सर (Bedsores) या नर्व डैमेज (Nerve Palsy) हो सकता है।
  • फिजियोथेरेपिस्ट ओटी टीम के साथ मिलकर यह सुनिश्चित करते हैं कि मरीज के जोड़ों (Joints) और रीढ़ की हड्डी (Spine) को सही एलाइनमेंट में रखा जाए और दबाव वाले हिस्सों पर उचित कुशनिंग (Cushioning) की जाए।

ब. अवेक क्रेनियोटॉमी (Awake Craniotomy) में सहयोग

ब्रेन ट्यूमर की कुछ विशेष सर्जरियों में मरीज को पूरी तरह बेहोश नहीं किया जाता, ताकि सर्जन ट्यूमर निकालते समय दिमाग के महत्वपूर्ण हिस्सों को नुकसान न पहुंचा दे।

  • इस दौरान फिजियोथेरेपिस्ट ओटी में मौजूद रहकर लगातार मरीज के हाथ-पैरों की मूवमेंट (Motor function) चेक करते हैं।
  • जैसे ही सर्जन किसी नस के पास पहुंचते हैं, फिजियोथेरेपिस्ट मरीज से उंगलियां हिलाने या ग्रिप बनाने को कहते हैं। यदि मरीज की पकड़ कमजोर होने लगती है, तो वे तुरंत सर्जन को अलर्ट करते हैं, जिससे पैरालिसिस का खतरा टल जाता है।

स. ऑर्थोपेडिक सर्जरियों में बायोमैकेनिकल असेसमेंट

जटिल ऑर्थोपेडिक सर्जरियों (जैसे लिगामेंट रिकंस्ट्रक्शन या जॉइंट रिप्लेसमेंट) के दौरान, सर्जन द्वारा इंप्लांट फिक्स करने के बाद फिजियोथेरेपिस्ट ओटी टेबल पर ही जॉइंट की पैसिव मूवमेंट (Passive Range of Motion) चेक कर सकते हैं। वे यह सुनिश्चित करते हैं कि नया जॉइंट बायोमैकेनिकल रूप से सही काम कर रहा है या नहीं।

4. सर्जरी के तुरंत बाद (Immediate Post-operative Phase / PACU)

सर्जरी के खत्म होने के बाद जब मरीज को रिकवरी रूम (Post-Anesthesia Care Unit – PACU) या आईसीयू (ICU) में शिफ्ट किया जाता है, तब फिजियोथेरेपिस्ट का सबसे चुनौतीपूर्ण काम शुरू होता है। इस चरण को एक्यूट केयर फिजियोथेरेपी (Acute Care Physiotherapy) कहा जाता है।

1. फेफड़ों को सिकुड़ने से बचाना (Preventing Atelectasis)

जनरल एनेस्थीसिया और दर्द निवारक दवाओं (Painkillers/Opioids) के कारण मरीज गहरी सांस नहीं ले पाता। इसके परिणामस्वरूप फेफड़ों के निचले हिस्सों में हवा नहीं पहुंचती और वायुकोष सिकुड़ जाते हैं, जिसे एटलेक्टेसिस (Atelectasis) कहते हैं।

  • चेस्ट फिजियोथेरेपी (Chest PT): फिजियोथेरेपिस्ट तुरंत इंटरवीन करते हैं। वे पर्कशन (Percussion), वाइब्रेशन (Vibration) और पोस्टुरल ड्रेनेज (Postural Drainage) जैसी तकनीकों का उपयोग करके फेफड़ों में जमा कफ (Secretions) को ढीला करते हैं।
  • मरीज को सर्जरी से पहले सिखाई गई स्पायरोमेट्री का अभ्यास करवाया जाता है, जिससे निमोनिया (Post-operative Pneumonia) का खतरा काफी कम हो जाता है।

2. डीप वेन थ्रोम्बोसिस (DVT) से बचाव

सर्जरी के बाद लंबे समय तक बिस्तर पर लेटे रहने से पैरों की नसों में खून का बहाव धीमा हो जाता है, जिससे खून के थक्के (Blood Clots) जमने का खतरा रहता है। इसे डीप वेन थ्रोम्बोसिस (DVT) कहते हैं। अगर यह थक्का टूटकर फेफड़ों में चला जाए (Pulmonary Embolism), तो यह जानलेवा हो सकता है।

  • फिजियोथेरेपिस्ट मरीज के बिस्तर पर लेटे-लेटे ही एंकल पम्प्स (Ankle Pumps) और पैरों की स्ट्रेचिंग शुरू करवा देते हैं।
  • मांसपेशियों के संकुचन (Muscle contraction) से नसों में खून का संचार तेज होता है और क्लॉटिंग का खतरा टल जाता है।

3. अर्ली मोबिलाइजेशन (Early Mobilization)

“जितनी जल्दी मरीज बिस्तर से उठेगा, उतनी जल्दी वह घर जाएगा।” यह आधुनिक सर्जरी का मूल मंत्र है।

  • सर्जरी के कुछ ही घंटों बाद (सर्जरी के प्रकार पर निर्भर करते हुए), फिजियोथेरेपिस्ट मरीज को बिस्तर पर करवट लेना, उठकर बैठना और बिस्तर के किनारे पैर लटकाकर (Dangling) बैठना सिखाते हैं।
  • ऑर्थोपेडिक या एब्डोमिनल सर्जरी के बाद, मरीज को वॉकर या सपोर्ट की मदद से पहले कुछ कदम चलवाए जाते हैं। अर्ली मोबिलाइजेशन से आंतों की गति (Bowel movement) जल्दी शुरू होती है, मांसपेशियों का क्षरण (Muscle Wasting) रुकता है और मरीज का आत्मविश्वास बढ़ता है।

4. दर्द प्रबंधन और पोस्चर (Pain Management & Posture)

सर्जरी के बाद गलत पोस्चर दर्द को कई गुना बढ़ा सकता है। फिजियोथेरेपिस्ट मरीज को दर्द कम करने वाली पोजीशन में लेटना (Positioning) और बिना टांकों पर जोर डाले बिस्तर से उठने की तकनीक (Log-rolling technique) सिखाते हैं। वे TENS (Transcutaneous Electrical Nerve Stimulation) जैसी इलेक्ट्रोथेरेपी मशीनों का उपयोग करके भी एक्यूट दर्द को कम करने में मदद कर सकते हैं।

5. विभिन्न बड़ी सर्जरियों में विशिष्ट भूमिकाएं

पेरिऑपरेटिव फिजियोथेरेपी का तरीका सर्जरी के प्रकार के अनुसार बदल जाता है:

  • कार्डियोथोरेसिक सर्जरी (जैसे CABG या ओपन हार्ट सर्जरी): इन सर्जरियों में छाती की हड्डी (Sternum) को काटा जाता है। फिजियोथेरेपिस्ट यह सुनिश्चित करते हैं कि मरीज खांसते समय या उठते समय स्टर्नम को कुशन (Sternal Precautions) से सपोर्ट करे, ताकि हड्डी को जुड़ने में कोई परेशानी न हो।
  • पेट की सर्जरी (Abdominal Surgery): इनमें फेफड़ों के संक्रमण का खतरा सबसे ज्यादा होता है क्योंकि मरीज दर्द के कारण डायाफ्राम का पूरा उपयोग नहीं कर पाता। यहां डीप ब्रीदिंग और एब्डोमिनल स्प्लिंटिंग सबसे महत्वपूर्ण होती है।
  • ऑर्थोपेडिक सर्जरी (जैसे जॉइंट रिप्लेसमेंट): घुटने या कूल्हे की सर्जरी के तुरंत बाद (उसी दिन), फिजियोथेरेपिस्ट नया जॉइंट हिलाना (Passive/Active motion) और मरीज को वजन डालकर (Weight-bearing) चलना सिखाना शुरू कर देते हैं, ताकि जॉइंट में अकड़न (Stiffness) न आए।

6. निष्कर्ष

ऑपरेशन थियेटर में एक बड़ी सर्जरी का सफल होना केवल आधी लड़ाई जीतना है; बाकी की आधी लड़ाई रिकवरी रूम और पोस्ट-ऑप वार्ड में लड़ी जाती है।

पेरिऑपरेटिव केयर में एक फिजियोथेरेपिस्ट का हस्तक्षेप एक “लक्जरी” नहीं, बल्कि एक चिकित्सीय आवश्यकता है। सर्जरी से पहले की शारीरिक और मानसिक तैयारी से लेकर, ऑपरेशन थियेटर में पोज़िशनिंग और सर्जरी के तुरंत बाद मरीज को अपने पैरों पर खड़ा करने तक—फिजियोथेरेपिस्ट रिकवरी की प्रक्रिया को न केवल सुरक्षित बनाते हैं, बल्कि अस्पताल में बिताए जाने वाले समय (Hospital Stay) और इलाज के खर्च को भी काफी कम करते हैं। सही पेरिऑपरेटिव फिजियोथेरेपी के बिना, किसी भी बड़ी सर्जरी की सफलता को पूर्ण नहीं माना जा सकता।

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