हाइपरमोबिलिटी (Hypermobility): ज्यादा लचीले शरीर वालों को योग करते समय क्या सावधानियां बरतनी चाहिए?
सामान्य तौर पर, जब हम ‘योग’ के बारे में सोचते हैं, तो हमारे दिमाग में एक अत्यधिक लचीले शरीर की तस्वीर उभरती है। ऐसा लगता है कि जो व्यक्ति अपने शरीर को जितना मोड़ सकता है, वह उतना ही अच्छा योगी है। लेकिन, क्या बहुत अधिक लचीलापन हमेशा फायदेमंद होता है? मेडिकल और फिजियोथेरेपी की भाषा में इसे ‘हाइपरमोबिलिटी’ (Hypermobility) कहा जाता है। हाइपरमोबिलिटी वाले लोगों के लिए योग का अभ्यास एक दोधारी तलवार की तरह हो सकता है। यह लेख विस्तार से बताएगा कि हाइपरमोबिलिटी क्या है और ऐसे लोगों को योग करते समय किन विशेष सावधानियों का पालन करना चाहिए ताकि वे चोटों से बच सकें और योग का पूरा लाभ उठा सकें।
हाइपरमोबिलिटी (Hypermobility) क्या है?
हाइपरमोबिलिटी का सीधा अर्थ है जोड़ों (joints) का अपनी सामान्य सीमा (normal range of motion) से अधिक मुड़ जाना या खुल जाना। यह स्थिति अक्सर उन लिगामेंट्स (ligaments) के ढीले होने के कारण होती है, जो हमारी हड्डियों को एक साथ जोड़ कर रखते हैं और जोड़ों को स्थिरता (stability) प्रदान करते हैं। जब लिगामेंट्स जरूरत से ज्यादा लचीले होते हैं, तो जोड़ अस्थिर हो जाते हैं।
कुछ लोगों में यह स्थिति आनुवंशिक (genetic) होती है। जिन लोगों का शरीर हाइपरमोबाइल होता है, वे बिना किसी खास प्रयास के अपनी उंगलियों को पीछे की तरफ मोड़ सकते हैं, घुटनों या कोहनियों को सामान्य से ज्यादा सीधा (lock) कर सकते हैं, या आसानी से अपने हाथों को जमीन पर पूरी तरह से टिका सकते हैं। इसे अक्सर “डबल-ज्वाइंटेड” (double-jointed) होना भी कहा जाता है।
योग हाइपरमोबिलिटी वालों के लिए जोखिम भरा क्यों हो सकता है?
योग में अक्सर स्ट्रेचिंग (stretching) और शरीर को खोलने पर जोर दिया जाता है। एक सामान्य व्यक्ति के लिए, योग की मुद्राएं मांसपेशियों को खोलती हैं और लचीलापन बढ़ाती हैं। लेकिन, हाइपरमोबिलिटी वाले व्यक्ति के लिए मुख्य समस्या यह है कि वे पहले से ही जरूरत से ज्यादा लचीले हैं।
जब ऐसे लोग योग करते हैं, तो वे अक्सर मांसपेशियों के बजाय अपने जोड़ों और लिगामेंट्स पर सीधा खिंचाव डालते हैं। क्योंकि उनके लिगामेंट्स पहले से ही ढीले हैं, इस अतिरिक्त खिंचाव से लिगामेंट्स में माइक्रो-टीयर (सूक्ष्म दरारें) आ सकती हैं, जोड़ों में क्रोनिक दर्द हो सकता है, और यहां तक कि डिसलोकेशन (जोड़ का अपनी जगह से खिसक जाना) का खतरा भी बहुत अधिक बढ़ जाता है। इसके अलावा, हाइपरमोबाइल लोगों में अक्सर ‘प्रोप्रियोसेप्शन’ (Proprioception)—यानी शरीर को यह महसूस करने की क्षमता कि उसके अंग अंतरिक्ष में कहां हैं—कमजोर होता है। इस कारण उन्हें यह पता नहीं चलता कि वे अपने जोड़ों को उनकी सुरक्षित सीमा से कितना ज्यादा बाहर खींच रहे हैं।
ज्यादा लचीले शरीर वालों को योग करते समय क्या सावधानियां बरतनी चाहिए?
यदि आपका शरीर हाइपरमोबाइल है, तो इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि आपको योग छोड़ देना चाहिए। बल्कि, आपको अपनी योग प्रैक्टिस का तरीका बदलने की जरूरत है। यहां कुछ प्रमुख सावधानियां दी गई हैं:
1. स्ट्रेचिंग के बजाय स्ट्रेंथ (ताकत) और स्टेबिलिटी पर फोकस करें
आपका मुख्य लक्ष्य और अधिक लचीला होना नहीं है, बल्कि जो लचीलापन आपके पास पहले से है, उसे नियंत्रित करने के लिए ताकत विकसित करना है। योग करते समय इस बात पर ध्यान दें कि मुद्रा में खुद को स्थिर कैसे रखा जाए। मांसपेशियों की ताकत आपके ढीले लिगामेंट्स की भरपाई करती है और जोड़ों को सुरक्षित रखती है।
2. जोड़ों को ‘लॉक’ (Lock) करने से बचें – ‘माइक्रो-बेंड’ का नियम अपनाएं
हाइपरमोबाइल लोग अक्सर खड़े होने वाले आसनों में अपने घुटनों को और हाथों के बल किए जाने वाले आसनों (जैसे डाउनवर्ड डॉग या प्लैंक) में अपनी कोहनियों को पीछे की तरफ पूरा धकेल देते हैं (हाइपर-एक्सटेंशन)।
- सावधानी: हमेशा अपने घुटनों और कोहनियों में एक हल्का सा मोड़ (Micro-bend) बनाए रखें। यह शुरुआत में बहुत अजीब और थका देने वाला लग सकता है क्योंकि अब आपका वजन जोड़ों पर टिकने के बजाय मांसपेशियों पर आ गया है, लेकिन यही सही तरीका है।
3. अपनी शारीरिक सीमा (Range of Motion) का सम्मान करें
सिर्फ इसलिए कि आप किसी आसन में बहुत गहराई तक जा सकते हैं, इसका मतलब यह नहीं है कि आपको जाना चाहिए।
- सावधानी: अपनी क्षमता के 100% तक स्ट्रेच करने के बजाय, 70% से 80% पर ही रुक जाएं। उस स्थिति में रहकर अपनी मांसपेशियों को संलग्न (engage) करने पर ध्यान दें। गहराई में जाने से ज्यादा महत्वपूर्ण है सही पॉश्चर (alignment) बनाए रखना।
4. मांसपेशियों को सक्रिय (Engage) रखें
पैसिव स्ट्रेचिंग (बिना मांसपेशियों की ताकत लगाए स्ट्रेच करना) आपके लिए बहुत नुकसानदायक हो सकती है। किसी भी आसन में जाते समय या रुकते समय उस हिस्से की मांसपेशियों को टाइट रखें। उदाहरण के लिए, जब आप हैमस्ट्रिंग (जांघ के पीछे की मांसपेशी) को स्ट्रेच कर रहे हों, तो अपनी क्वाड्रिसेप्स (जांघ के आगे की मांसपेशी) को कस कर रखें ताकि घुटने के जोड़ पर दबाव न पड़े।
5. योगा प्रॉप्स (Yoga Props) का भरपूर उपयोग करें
ब्लॉक्स (Blocks), स्ट्रैप्स (Straps) और बोल्स्टर (Bolsters) आपके सबसे अच्छे दोस्त हैं।
- ब्लॉक्स का उपयोग करने से आपको फर्श तक पहुंचने के लिए अपनी पीठ या कंधों को जरूरत से ज्यादा नहीं मोड़ना पड़ता।
- स्ट्रैप्स का उपयोग पैरों या हाथों को बांधने के लिए करें ताकि आप अपनी प्राकृतिक सीमा से आगे न खिंच जाएं।
6. प्रोप्रियोसेप्शन (Proprioception) विकसित करें
अपने शरीर की स्थिति के प्रति जागरूकता बढ़ाएं। योग करते समय आंखें बंद करके महसूस करने की कोशिश करें कि आपके जोड़ किस स्थिति में हैं। शीशे के सामने अभ्यास करना भी फायदेमंद हो सकता है ताकि आप देख सकें कि कहीं आप अनजाने में अपने जोड़ों को लॉक तो नहीं कर रहे हैं।
7. थकान के समय विशेष ध्यान रखें
जब मांसपेशियां थक जाती हैं, तो शरीर स्वाभाविक रूप से सहारा लेने के लिए जोड़ों और लिगामेंट्स पर निर्भर होने लगता है। थकावट की स्थिति में योगाभ्यास करते समय चोट लगने का खतरा सबसे ज्यादा होता है। इसलिए, यदि आप थक गए हैं, तो आराम करें या आसान मुद्राओं (जैसे बालासन) का अभ्यास करें।
हाइपरमोबिलिटी के लिए कौन से योगासन सबसे ज्यादा फायदेमंद हैं?
हाइपरमोबिलिटी वाले व्यक्तियों को ऐसे आसनों का चुनाव करना चाहिए जो मांसपेशियों की ताकत और कोर (core) स्टेबिलिटी को बढ़ाते हैं:
- प्लैंक पोज़ (फलकासन) और चतुरंग दंडासन: ये आसन पूरे शरीर, विशेषकर कोर, कंधे और कलाइयों की ताकत बढ़ाते हैं। (ध्यान रहे: कोहनियों को लॉक न करें)।
- वीरभद्रासन श्रृंखला (Warrior Poses I, II, & III): ये पैरों की मांसपेशियों (क्वाड्रिसेप्स और ग्लूट्स) को मजबूत करते हैं और पेल्विक स्थिरता (pelvic stability) लाते हैं।
- वृक्षासन (Tree Pose) और गरुड़ासन (Eagle Pose): संतुलन बनाने वाले ये आसन प्रोप्रियोसेप्शन को बेहतर बनाने में बहुत मदद करते हैं।
- सेतु बंधासन (Bridge Pose) और शलभासन (Locust Pose): ये रीढ़ की हड्डी के आस-पास की मांसपेशियों और पीठ के निचले हिस्से को मजबूत करने के लिए बेहतरीन हैं।
किन योगासनों से बचें या उनमें बदलाव (Modify) करें?
- अत्यधिक बैकबेंड्स (Extreme Backbends): पूर्ण चक्रासन (Wheel Pose) या पूर्ण भुजंगासन जैसे आसनों में रीढ़ की हड्डी पर बहुत अधिक दबाव पड़ सकता है। इनके बजाय बेबी कोबरा (Baby Cobra) का अभ्यास करें।
- डीप हिप ओपनर्स (Deep Hip Openers): कपोतासन (Pigeon Pose) या बद्ध कोणासन (Butterfly Pose) में कूल्हे के जोड़ों पर बहुत खिंचाव आता है। अगर इन्हें करना हो, तो घुटनों और जांघों के नीचे योगा ब्लॉक्स का सहारा जरूर लें।
- यिन योग (Yin Yoga): यिन योग में आसनों को लंबे समय (3 से 5 मिनट) तक पैसिव रूप से होल्ड किया जाता है, जो ढीले लिगामेंट्स वालों के लिए बिल्कुल भी उपयुक्त नहीं है।
निष्कर्ष
योग एक बेहतरीन अभ्यास है जो शरीर और मन दोनों को संतुलित करता है। हाइपरमोबिलिटी वाले लोगों को बस अपनी सोच में थोड़ा बदलाव करने की आवश्यकता है: “मुझे और अधिक लचीला नहीं होना है, बल्कि मुझे अधिक मजबूत और स्थिर होना है।” सही मार्गदर्शन, शरीर की जागरूकता और उचित सावधानियों के साथ, हाइपरमोबाइल शरीर वाले व्यक्ति भी सुरक्षित रूप से योग के अनगिनत लाभ प्राप्त कर सकते हैं। किसी भी नई एक्सरसाइज या योग रूटीन को शुरू करने से पहले, विशेष रूप से यदि आपको जोड़ों में दर्द रहता है, तो एक अनुभवी योग प्रशिक्षक और फिजियोथेरेपिस्ट से सलाह लेना हमेशा एक समझदारी भरा कदम होता है।
