स्लिप डिस्क (Slip Disc) क्या है? फिजियोथेरेपी से इलाज
स्लिप डिस्क (Slip Disc) क्या है? फिजियोथेरेपी से इलाज 🤕🚶♂️
स्लिप डिस्क, जिसे चिकित्सकीय भाषा में हर्नियेटेड डिस्क (Herniated Disc), प्रोलैप्स्ड डिस्क (Prolapsed Disc), या रुप्तर डिस्क (Ruptured Disc) भी कहा जाता है, पीठ और गर्दन के दर्द के सबसे आम और तीव्र कारणों में से एक है। यह स्थिति तब उत्पन्न होती है जब रीढ़ की हड्डियों (Vertebrae) के बीच स्थित नरम गद्दीनुमा संरचना, जिसे इंटर-वर्टिब्रल डिस्क (Inter-vertebral Disc) कहा जाता है, क्षतिग्रस्त हो जाती है।
डिस्क का मुख्य कार्य रीढ़ को झटका सहने (Shock Absorption) की क्षमता प्रदान करना और हड्डियों के बीच घर्षण (Friction) को रोकना है। जब डिस्क का बाहरी कठोर आवरण (Annulus Fibrosus) फट जाता है, तो अंदर का जेली जैसा पदार्थ (Nucleus Pulposus) बाहर निकलकर आसपास की तंत्रिकाओं (Nerves), विशेष रूप से साइटिका तंत्रिका (Sciatic Nerve) पर दबाव डालता है। इसी दबाव के कारण गंभीर दर्द और संबंधित लक्षण उत्पन्न होते हैं।
स्लिप डिस्क के सफल उपचार में फिजियोथेरेपी (Physiotherapy) की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह सर्जरी के बिना दर्द से राहत, कार्यक्षमता (Functionality) की बहाली और समस्या की पुनरावृत्ति (Recurrence) को रोकने का एक प्रभावी तरीका प्रदान करती है।
१. स्लिप डिस्क के कारण और लक्षण
स्लिप डिस्क किसी भी आयु वर्ग को प्रभावित कर सकती है, लेकिन यह आमतौर पर ३० से ५० वर्ष की आयु के लोगों में अधिक होती है।
क. प्रमुख कारण
- आयु और घिसाव: समय के साथ डिस्क अपनी नमी खो देती है और अधिक भंगुर (Brittle) हो जाती है।
- अनुचित भार उठाना: गलत तकनीक से भारी वज़न उठाने से डिस्क पर अचानक अत्यधिक दबाव पड़ता है।
- खराब मुद्रा (Poor Posture): लंबे समय तक गलत मुद्रा में बैठना या खड़े रहना।
- आघात (Trauma): अचानक झटका या चोट (जैसे गिरना या कार दुर्घटना)।
- मोटापा: अधिक वजन होने से रीढ़ पर लगातार दबाव बना रहता है।
ख. सामान्य लक्षण
- स्थानीय दर्द: प्रभावित क्षेत्र (गर्दन या कमर) में तीव्र या पुराना दर्द। कमर में स्लिप डिस्क सबसे आम है (L4-L5 या L5-S1)।
- रेडिएटिंग दर्द (Radiating Pain): कमर में डिस्क होने पर दर्द नितंबों (Buttocks) से होता हुआ पैर के पिछले हिस्से तक जाता है, जिसे साइटिका (Sciatica) कहा जाता है। गर्दन में डिस्क होने पर दर्द बांहों और हाथों तक जाता है।
- सुन्नता और झुनझुनी (Numbness and Tingling): तंत्रिका पर दबाव के कारण पैर या बांह में सुन्नता या “पिन और सुई” (Pins and Needles) जैसी अनुभूति।
- मांसपेशी में कमजोरी (Muscle Weakness): प्रभावित तंत्रिका द्वारा नियंत्रित मांसपेशियों में कमजोरी आ सकती है।
- गति की सीमा में कमी: पीठ या गर्दन को मोड़ना या झुकाना मुश्किल और दर्दनाक हो जाता है।
२. स्लिप डिस्क के इलाज में फिजियोथेरेपी की भूमिका
आधुनिक चिकित्सा पद्धतियों में, अधिकांश स्लिप डिस्क मामलों में, फिजियोथेरेपी को दर्द प्रबंधन और पुनर्वास (Rehabilitation) की पहली पंक्ति का उपचार (First Line of Treatment) माना जाता है।
क. तीव्र चरण में हस्तक्षेप (Acute Phase Intervention)
फिजियोथेरेपिस्ट का शुरुआती लक्ष्य दर्द और सूजन को कम करना होता है:
- दर्द प्रबंधन तकनीक: दर्द और मांसपेशियों की ऐंठन को कम करने के लिए बर्फ, हीट थेरेपी, या इलेक्ट्रोथेरेपी मोडालीटीज़ (Electrotherapy Modalities) जैसे TENS (ट्रांसक्यूटेनियस इलेक्ट्रिकल नर्व स्टिमुलेशन) या अल्ट्रासाउंड का उपयोग।
- आराम की सही मुद्रा: मरीज़ को ऐसी दर्द-मुक्त मुद्राएँ (Pain-Free Postures) सिखाना जिनमें तंत्रिका पर दबाव कम हो।
- कोमल गतिशीलता: चिकित्सक द्वारा निर्देशित कोमल जॉइंट मोबिलाइजेशन (Gentle Joint Mobilization) तकनीकों का उपयोग, खासकर मैकेंजी विधि (McKenzie Method) जैसी विशिष्ट तकनीकें जो डिस्क के पदार्थ को वापस केंद्र में ले जाने (सेंट्रलाइज़ेशन) में मदद करती हैं।
ख. पुनर्वास चरण में हस्तक्षेप (Rehabilitation Phase Intervention)
एक बार तीव्र दर्द कम हो जाने पर, फोकस स्नायुओं को मजबूत करने और कार्यक्षमता को बहाल करने पर स्थानांतरित हो जाता है:
१. कोर स्थिरीकरण अभ्यास (Core Stabilization Exercises)
ये स्लिप डिस्क के उपचार का आधार हैं। मजबूत कोर स्नायु (पैर के निचले हिस्से और पेट के गहरे स्नायु) रीढ़ को सहारा देते हैं और डिस्क पर अनावश्यक दबाव को रोकते हैं।
- अभ्यास: पेल्विक टिल्ट्स (Pelvic Tilts), चिन टक्स, और बर्ड-डॉग (Bird-Dog) जैसे अभ्यास धीरे-धीरे शुरू किए जाते हैं।
२. लचीलापन और स्ट्रेचिंग (Flexibility and Stretching)
- उद्देश्य: उन मांसपेशियों को खींचना जो स्लिप डिस्क के कारण कस गई हैं (जैसे हैमस्ट्रिंग, हिप फ्लेक्सर्स)। इससे चाल (Gait) और मुद्रा में सुधार होता है।
- तंत्रिका ग्लाइडिंग (Nerve Gliding): यदि तंत्रिका पर दबाव है, तो फिजियोथेरेपिस्ट तंत्रिका की गतिशीलता (Mobility) को बहाल करने और तंत्रिका जलन को कम करने के लिए नर्व ग्लाइडिंग (जैसे स्लम टेस्ट मॉडिफिकेशन) अभ्यास सिखाते हैं।
३. कार्यात्मक प्रशिक्षण और एर्गोनॉमिक्स (Functional Training and Ergonomics)
- उचित यांत्रिकी (Body Mechanics): मरीज़ को झुकने, मोड़ने, उठाने और बैठने की सही तकनीक सिखाई जाती है ताकि भविष्य में डिस्क पर तनाव न पड़े।
- एर्गोनॉमिक्स सुधार: कार्यस्थल पर और घर पर बैठने, खड़े होने और सोने की मुद्रा में सुधार के लिए विस्तृत मार्गदर्शन प्रदान करना।
ग. मैनुअल थेरेपी (Manual Therapy)
फिजियोथेरेपिस्ट अपने हाथों का उपयोग करके सीधे प्रभावित क्षेत्रों पर काम करते हैं:
- मोबिलाइजेशन: रीढ़ के उन जोड़ों को धीरे से हिलाना जो अकड़ गए हैं।
- ट्रैक्शन (Traction): कुछ मामलों में, गर्दन या कमर पर हल्का खिंचाव (Pull) देने से डिस्क स्पेस खुलती है और तंत्रिका पर दबाव कम होता है।
३. फिजियोथेरेपी क्यों है आवश्यक?
- सर्जरी से बचाव: अधिकांश स्लिप डिस्क के मामले (९०% तक) फिजियोथेरेपी और सक्रिय प्रबंधन से ठीक हो सकते हैं, जिससे अनावश्यक सर्जरी से बचा जा सकता है।
- दीर्घकालिक समाधान: यह केवल दर्द को दबाता नहीं है, बल्कि स्नायु को मजबूत करके समस्या के मूल कारण को संबोधित करता है।
- शिक्षा: यह मरीज़ को अपने शरीर और स्थिति का प्रबंधन करना सिखाता है, जिससे उन्हें सशक्तिकरण (Empowerment) महसूस होता है।
निष्कर्ष
स्लिप डिस्क एक ऐसी स्थिति है जिसके लिए एक संरचित, प्रगतिशील और मरीज़-केंद्रित दृष्टिकोण की आवश्यकता होती है। फिजियोथेरेपी दर्द से राहत देने, स्नायु शक्ति को बहाल करने और मरीज़ को उनकी दैनिक जीवनशैली में वापस लाने में सबसे प्रभावी भूमिका निभाती है। यदि आपको स्लिप डिस्क का संदेह है, तो दर्द कम होने का इंतजार किए बिना, एक योग्य फिजियोथेरेपिस्ट से परामर्श लें ताकि सही समय पर सही उपचार शुरू किया जा सके और पुरानी समस्याओं से बचा जा सके।
