एड़ी के पीछे नस में दर्द
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एड़ी के पीछे नस में दर्द (अकिलीज़ टेंडोनाइटिस): स्ट्रेचिंग और आइसिंग का सही तरीका

सुबह बिस्तर से उठते ही पहला कदम रखते समय एड़ी के पीछे खिंचाव या जलन जैसा दर्द महसूस होता है? सीढ़ियाँ चढ़ते, दौड़ते या पंजों के बल खड़े होते समय वही जगह दुखती है? अगर हाँ, तो संभव है कि आपको अकिलीज़ टेंडोनाइटिस की समस्या हो। यह धावकों, खिलाड़ियों, लंबे समय तक खड़े रहने वाले लोगों और ऊँची एड़ी की चप्पल-जूते पहनने वालों में बहुत आम है। अच्छी बात यह है कि सही देखभाल, आइसिंग और स्ट्रेचिंग से ज़्यादातर मामले कुछ हफ्तों से कुछ महीनों में ठीक हो जाते हैं। इस लेख में हम समझेंगे कि एड़ी के पीछे नस में दर्द (अकिलीज़ टेंडोनाइटिस) क्या है, बर्फ और स्ट्रेचिंग कैसे करें, और कौन-सी गलतियों से बचना चाहिए।

अकिलीज़ टेंडन क्या है?

अकिलीज़ टेंडन हमारे शरीर की सबसे मोटी और मज़बूत नस (कंडरा) है। यह पिंडली की दो मांसपेशियों, यानी गैस्ट्रोक्नेमियस और सोलियस, को एड़ी की हड्डी से जोड़ती है। चलने, कूदने, दौड़ने और पंजों पर उठने में यही नस ज़ोर लगाती है। इसकी लंबाई में बार-बार ज़्यादा दबाव पड़ने पर इसमें सूजन, जलन और छोटी-छोटी क्षति होने लगती है। इसी स्थिति को अकिलीज़ टेंडोनाइटिस (या कई बार टेंडिनोपैथी) कहा जाता है।

आम लक्षण

  • एड़ी के ठीक ऊपर, पीछे की नस में दर्द या अकड़न, खासकर सुबह के समय
  • गतिविधि या दौड़ के बाद दर्द का बढ़ना
  • नस को दबाने पर दर्द और हल्की सूजन या गाँठ जैसा उभार
  • पिंडली में कसाव और टखने को ऊपर मोड़ने में कठिनाई
  • शुरुआत में हल्के चलने से दर्द कम होना, पर देर तक काम करने पर फिर बढ़ना

मुख्य कारण

  1. अचानक व्यायाम बढ़ाना: दौड़ने की दूरी, गति या पहाड़ी चढ़ाई अचानक बढ़ा देना।
  2. कसी हुई पिंडली की मांसपेशियाँ: इससे नस पर अतिरिक्त खिंचाव आता है।
  3. गलत जूते: घिसे हुए, सपाट या सहारा न देने वाले जूते, या लगातार ऊँची एड़ी की चप्पलें।
  4. सख्त सतह पर दौड़ना: कंक्रीट या सड़क पर बिना तैयारी के बहुत दौड़ना।
  5. पैरों की बनावट: चपटे तलवे (फ्लैट फीट) या पैर का अंदर की ओर ज़्यादा मुड़ना।
  6. उम्र और वज़न: 30-40 की उम्र के बाद नस की लचक घटती है; अधिक वज़न भी दबाव बढ़ाता है।
  7. कुछ दवाइयाँ और स्थितियाँ: जैसे कुछ एंटीबायोटिक (फ्लूरोक्विनोलोन वर्ग) और मधुमेह में नस का जोखिम बढ़ सकता है।

सबसे पहले क्या करें: आराम और भार का प्रबंधन

दर्द की शुरुआत में सबसे ज़रूरी है नस को दबाव से राहत देना। इसका मतलब पूरा बिस्तर पकड़ लेना नहीं है। दौड़ना, कूदना और तेज़ चढ़ाई कुछ समय के लिए रोक दें, और उनकी जगह तैराकी या साइकिलिंग जैसी कम दबाव वाली कसरत करें, बशर्ते उनसे दर्द न बढ़े। रोज़मर्रा के हल्के चलने-फिरने की अनुमति है। नियम सीधा है: जिस गतिविधि से दर्द तेज़ हो या अगले दिन तक बना रहे, उसे कम करें।

आइसिंग (बर्फ से सिकाई) का सही तरीका

बर्फ दर्द और सूजन को कम करने में मदद करती है। यह खासकर तब उपयोगी है जब दर्द नया हो, गतिविधि के बाद बढ़ा हो या नस के आसपास सूजन महसूस हो।

चरण-दर-चरण विधि

  1. सामग्री लें: बर्फ के टुकड़े प्लास्टिक बैग में, जेल आइस पैक, या जमी हुई सब्ज़ियों का पैकेट। एक पतला सूती कपड़ा या तौलिया भी रखें।
  2. सही मुद्रा: आराम से बैठें या लेटें और पैर को थोड़ा ऊँचा रखें, ताकि सूजन उतरने में मदद मिले।
  3. कपड़े की परत ज़रूर लगाएँ: बर्फ को सीधे त्वचा पर न रखें, वरना बर्फ से जलन (आइस बर्न) हो सकती है।
  4. सही जगह: बर्फ का पैक एड़ी के ऊपर से पिंडली के निचले हिस्से तक, दर्द वाली नस पर रखें।
  5. समय: एक बार में 10 से 15 मिनट, अधिकतम 20 मिनट। इससे ज़्यादा न करें।
  6. दोहराव: शुरुआती दो-तीन दिनों में दिन में 3 से 4 बार, हर बार के बीच कम से कम 1.5-2 घंटे का अंतर रखें।
  7. बाद में: सिकाई के बाद त्वचा को देखें। हल्का लाल होना सामान्य है, पर गहरा लाल, सफ़ेद या सुन्न पड़ना ठीक नहीं है।

आइस मसाज (वैकल्पिक)

कुछ लोग पानी जमाए हुए पेपर कप से नस पर हल्की गोलाई में मालिश करते हैं। इसे 5 से 7 मिनट से अधिक न करें और त्वचा पर नज़र रखें। यह बहुत हल्के दबाव से ही होनी चाहिए।

आइसिंग में सावधानियाँ

  • खुले घाव, त्वचा के संक्रमण या बहुत संवेदनशील त्वचा पर बर्फ न लगाएँ।
  • मधुमेह, नसों की कमज़ोरी (न्यूरोपैथी), खराब रक्त संचार या रेनॉ जैसी बीमारी में बर्फ का प्रयोग डॉक्टर से पूछकर करें, क्योंकि ऐसे में ठंड का एहसास कम हो सकता है।
  • बर्फ लगाते समय सो न जाएँ।
  • एक सामान्य नियम: दर्द कम करने के लिए बर्फ मदद करती है, पर यह इलाज का अकेला उपाय नहीं है। असली सुधार नस को धीरे-धीरे मज़बूत और लचीला बनाने से आता है।

गरम सिकाई कब?

जब शुरुआती तीव्र दर्द और सूजन कम हो जाए और केवल अकड़न बची हो, तब स्ट्रेचिंग से पहले 5 से 10 मिनट की हल्की गुनगुनी सिकाई या गुनगुने पानी में पैर रखना नस को ढीला करने में मदद कर सकता है। गतिविधि के बाद दर्द बढ़ने पर फिर बर्फ का उपयोग करें।

स्ट्रेचिंग का सही तरीका

स्ट्रेचिंग का लक्ष्य पिंडली की मांसपेशियों की लचक बढ़ाना है, जिससे नस पर पड़ने वाला खिंचाव कम हो। लेकिन ध्यान रखें, तीव्र दर्द के समय ज़ोरदार स्ट्रेच नुकसान कर सकता है। स्ट्रेचिंग हमेशा हल्की, धीमी और बिना झटके की होनी चाहिए। हल्का खिंचाव महसूस होना ठीक है, पर तेज़ या चुभने वाला दर्द हो तो तुरंत रुक जाएँ।

स्ट्रेचिंग के सामान्य नियम

  • पहले 5 मिनट टहलें या पैरों को हल्का गरम कर लें; ठंडी मांसपेशियों को न खींचें।
  • झटके या उछाल (बाउंसिंग) बिल्कुल न दें।
  • हर स्ट्रेच को 20 से 30 सेकंड तक थामें और 2 से 3 बार दोहराएँ।
  • साँस सामान्य रखें, रोकें नहीं।
  • दिन में 2 से 3 बार करें।

1. दीवार के सहारे पिंडली का स्ट्रेच (गैस्ट्रोक्नेमियस)

  1. दीवार से एक हाथ की दूरी पर खड़े होकर दोनों हथेलियाँ दीवार पर रखें।
  2. प्रभावित पैर को पीछे रखें, पंजा सीधा आगे की ओर और एड़ी पूरी तरह ज़मीन पर।
  3. पीछे वाला घुटना सीधा रखें और आगे वाला घुटना मोड़ते हुए शरीर को दीवार की ओर झुकाएँ।
  4. पिंडली में खिंचाव महसूस होने पर 20 से 30 सेकंड रुकें।
  5. 2-3 बार दोहराएँ।
Wall Calf Stretch
Wall Calf Stretch

2. घुटना मोड़कर पिंडली का स्ट्रेच (सोलियस)

यह पिंडली की गहरी मांसपेशी को खींचता है, जो अकिलीज़ से सीधे जुड़ी है।

  1. ऊपर जैसी ही मुद्रा में आएँ।
  2. अब पीछे वाला घुटना हल्का मोड़ें, पर एड़ी को ज़मीन पर दबाए रखें।
  3. पिंडली के निचले हिस्से और एड़ी के ऊपर खिंचाव महसूस होगा।
  4. 20 से 30 सेकंड थामें और 2-3 बार दोहराएँ।
घुटना मोड़कर पिंडली का स्ट्रेच
घुटना मोड़कर पिंडली का स्ट्रेच

3. तौलिया या पट्टे से बैठकर स्ट्रेच

जिन्हें खड़े होकर करने में तकलीफ़ हो, उनके लिए यह आसान विकल्प है।

  1. ज़मीन या बिस्तर पर पैर सीधे फैलाकर बैठें।
  2. तौलिया पंजे के आगे वाले हिस्से पर लपेटें।
  3. दोनों सिरे हाथों से पकड़कर पंजे को धीरे से अपनी ओर खींचें, घुटना सीधा रहे।
  4. 20 से 30 सेकंड रुकें, फिर छोड़ें। 2-3 बार दोहराएँ।
Towel Stretch
Towel Stretch

4. सीढ़ी के किनारे पर स्ट्रेच (धीमे से)

सीढ़ी पर पंजों के आगे वाला हिस्सा रखें, एड़ी हवा में, और दीवार या रेलिंग को पकड़कर एड़ी को धीरे से नीचे जाने दें। इसे केवल तब करें जब दर्द काफ़ी कम हो और बहुत हल्के ढंग से। शुरुआती दिनों में इसे न करें।

सीढ़ी के किनारे पर स्ट्रेच
सीढ़ी के किनारे पर स्ट्रेच

नस को मज़बूत करने वाला व्यायाम: एड़ी नीचे गिराना (हील ड्रॉप)

आधुनिक शोध बताते हैं कि लंबे समय के अकिलीज़ दर्द में केवल आराम और स्ट्रेचिंग काफ़ी नहीं है। नस को धीरे-धीरे दबाव सहने के लिए प्रशिक्षित करना ज़रूरी है। इसके लिए ‘एक्सेंट्रिक’ व्यायाम, जैसे हील ड्रॉप, सबसे ज़्यादा सुझाए जाते हैं।

  1. सीढ़ी के किनारे पर पंजों के बल खड़े हों, एड़ी हवा में, और रेलिंग पकड़ें।
  2. दोनों पैरों से पंजों पर ऊपर उठें।
  3. अब केवल प्रभावित पैर पर वज़न डालकर बहुत धीरे-धीरे (3 से 4 सेकंड में) एड़ी को सीढ़ी के स्तर से नीचे लाएँ।
  4. ऊपर उठने के लिए दूसरे, स्वस्थ पैर का सहारा लें।
  5. 10 से 15 बार का एक सेट करें और दिन में 2 से 3 सेट। शुरुआत में कम संख्या से शुरू करें।

इस दौरान हल्का दर्द या खिंचाव सहनीय है, पर तेज़ दर्द हो तो संख्या घटाएँ या रुकें। फिज़ियोथेरेपिस्ट की देखरेख में शुरू करना सबसे सुरक्षित रहता है। सुधार देखने के लिए आमतौर पर 6 से 12 हफ्ते तक नियमित अभ्यास चाहिए।

दैनिक जीवन में मददगार बातें

  • सही जूते: अच्छी गद्दी और एड़ी को सहारा देने वाले जूते चुनें। घिसे हुए जूते बदल दें।
  • हील लिफ्ट: डॉक्टर या फिज़ियोथेरेपिस्ट की सलाह पर जूतों में छोटी एड़ी की गद्दी लगाने से कुछ समय के लिए नस का खिंचाव घट सकता है।
  • ऊँची एड़ी से परहेज़, और पूरी तरह सपाट चप्पल भी नहीं: दोनों अतियाँ ठीक नहीं हैं। हल्की ऊँचाई वाला आरामदायक फुटवियर बेहतर है।
  • धीरे-धीरे वापसी: दर्द कम होने पर दौड़ना या खेल एकदम पुरानी तीव्रता से शुरू न करें। हर हफ्ते लगभग 10 प्रतिशत से ज़्यादा न बढ़ाएँ।
  • वज़न नियंत्रण और पर्याप्त हाइड्रेशन: इनसे नसों और जोड़ों पर दबाव कम रहता है।
  • पिंडली की मालिश: हल्की मालिश या फोम रोलर से पिंडली को ढीला करें, पर सीधे दर्द वाली नस पर ज़ोर से न दबाएँ।

क्या न करें

  • दर्द को नज़रअंदाज़ करके दौड़ते रहना या खेलते रहना।
  • दर्द में ज़ोरदार, झटके वाली स्ट्रेचिंग करना।
  • लंबे समय तक सिर्फ़ दर्द की गोली पर निर्भर रहना। दवा लेनी हो तो डॉक्टर या फार्मासिस्ट से पूछकर ही लें।
  • नस में बार-बार स्टेरॉयड इंजेक्शन लगवाना, क्योंकि इससे नस कमज़ोर होकर फटने का खतरा बढ़ सकता है। यह निर्णय केवल विशेषज्ञ की सलाह से हो।
  • नंगे पाँव सख्त फ़र्श पर लंबे समय तक चलना।

डॉक्टर को कब दिखाएँ?

नीचे दिए गए संकेतों में देर न करें और तुरंत चिकित्सक से मिलें:

  • टखने के पीछे अचानक ‘चट’ या ‘पॉप’ की आवाज़ के साथ तेज़ दर्द, मानो किसी ने लात मारी हो
  • पंजों के बल खड़े न हो पाना या चलने में पैर धकेलने की ताकत का अचानक खत्म होना
  • एड़ी के पीछे बहुत ज़्यादा सूजन, नीला-काला निशान या नस में खाली जगह जैसा महसूस होना
  • 2 से 3 हफ्ते के घरेलू उपचार के बाद भी दर्द में सुधार न होना या दर्द बढ़ना
  • रात में भी दर्द होना, बुखार या एड़ी के पास लालिमा और गर्मी
  • मधुमेह या अन्य बीमारियों के साथ यह समस्या होना

ये लक्षण अकिलीज़ नस के आंशिक या पूर्ण फटने की ओर इशारा कर सकते हैं, जिसमें जल्दी इलाज ज़रूरी है। डॉक्टर जाँच के लिए अल्ट्रासाउंड या एमआरआई करा सकते हैं।

एक नमूना दैनिक दिनचर्या

सुबह: बिस्तर पर बैठकर टखने को ऊपर-नीचे और गोल घुमाएँ, फिर तौलिया स्ट्रेच करें। उठने के बाद पहले कुछ कदम धीरे चलें।

दिन में: काम के बीच हर घंटे उठकर थोड़ा चलें। 5 मिनट के गरमाने के बाद दीवार वाले दोनों स्ट्रेच करें।

शाम को: हील ड्रॉप के सेट करें (अगर चिकित्सक ने मना न किया हो)।

रात में, अगर दर्द या सूजन हो: 15 मिनट पैर ऊँचा रखकर कपड़े में लपेटी बर्फ से सिकाई करें।

निष्कर्ष

एड़ी के पीछे की नस का दर्द धैर्य माँगता है। शुरुआत में बर्फ और भार में कमी से दर्द काबू में आता है, फिर हल्की स्ट्रेचिंग से लचक लौटती है, और अंत में एक्सेंट्रिक व्यायामों से नस मज़बूत बनती है। सही जूते, धीरे-धीरे गतिविधि बढ़ाना और शरीर के संकेतों को सुनना भविष्य में दोबारा दर्द होने से बचाता है। अगर दर्द कई हफ्तों में न घटे या ऊपर बताए गए खतरे के संकेत दिखें, तो विशेषज्ञ से ज़रूर मिलें।

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