क्लबफुट (Clubfoot) जन्मजात टेढ़े पैरों को बिना सर्जरी के प्लास्टर (Ponseti method) से कैसे सीधा करें।
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क्लबफुट (Clubfoot): जन्मजात टेढ़े पैरों को बिना सर्जरी के पोनसेटी विधि (Ponseti Method) से सीधा करने का सम्पूर्ण मार्गदर्शन

जब किसी परिवार में नवजात शिशु का जन्म होता है, तो खुशियों का माहौल होता है। लेकिन अगर माता-पिता यह देखें कि उनके बच्चे के पैर अंदर और नीचे की तरफ मुड़े हुए हैं, तो वे स्वाभाविक रूप से घबरा जाते हैं। इस स्थिति को मेडिकल भाषा में क्लबफुट (Clubfoot) या कंजेनिटल टैलिप्स इक्विनोवेरस (CTEV – Congenital Talipes Equinovarus) कहा जाता है।

अतीत में, इस समस्या को ठीक करने के लिए जटिल और दर्दनाक सर्जरी की आवश्यकता होती थी, जिसके कारण भविष्य में पैरों में अकड़न और दर्द की शिकायत रहती थी। लेकिन आज आधुनिक चिकित्सा विज्ञान, विशेष रूप से पोनसेटी विधि (Ponseti Method) के माध्यम से, इस समस्या का बिना किसी बड़ी सर्जरी के और बेहद सुरक्षित तरीके से 100% तक सफल इलाज संभव है।

यह लेख विशेष रूप से माता-पिता, स्वास्थ्य कर्मियों और फिजियोथेरेपी के छात्रों के लिए तैयार किया गया है, ताकि वे क्लबफुट और प्लास्टर (Ponseti Casting) के माध्यम से इसके गैर-सर्जिकल इलाज की पूरी प्रक्रिया को विस्तार से समझ सकें।

क्लबफुट (CTEV) क्या है?

क्लबफुट एक जन्मजात ऑर्थोपेडिक विकृति है जिसमें शिशु का पैर टखने (Ankle) के पास से मुड़ा हुआ होता है। यह विकृति एक या दोनों पैरों में हो सकती है। बायोमैकेनिक्स (Biomechanics) के नजरिए से देखें तो, क्लबफुट में पैर के अंदरूनी और पिछले हिस्से के टेंडन (मांसपेशियों को हड्डियों से जोड़ने वाले ऊतक) और लिगामेंट सामान्य से बहुत छोटे और सख्त (Tight) होते हैं। विशेष रूप से एड़ी के पीछे का टेंडन, जिसे अकिलीज़ टेंडन (Achilles Tendon) कहा जाता है, बहुत अधिक टाइट होता है, जो पैर को नीचे की ओर खींच कर रखता है।

क्लबफुट के मुख्य कारण

हालाँकि इसका सटीक कारण अभी भी पूरी तरह से स्पष्ट नहीं है, लेकिन इसे निम्नलिखित कारकों से जोड़ा जाता है:

  • आनुवंशिक (Genetic): यदि परिवार में पहले किसी को क्लबफुट रहा है, तो शिशु में इसके होने की संभावना बढ़ जाती है।
  • गर्भावस्था के दौरान स्थिति: गर्भ में एमनियोटिक द्रव (Amniotic fluid) की कमी या गर्भाशय में जगह की कमी के कारण भी पैर मुड़ सकते हैं (इसे पोस्चरल क्लबफुट कहते हैं)।
  • न्यूरोमस्कुलर विकार: कुछ मामलों में यह स्पाइना बिफिडा (Spina Bifida) जैसी तंत्रिका संबंधी समस्याओं के साथ जुड़ा हो सकता है।

पोनसेटी विधि (Ponseti Method) क्या है?

पोनसेटी विधि का विकास 1950 के दशक में डॉ. इग्नासियो पोनसेटी (Dr. Ignacio Ponseti) द्वारा किया गया था। यह क्लबफुट के इलाज के लिए विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) और दुनिया भर के ऑर्थोपेडिक व फिजियोथेरेपी समुदायों द्वारा स्वीकृत ‘गोल्ड स्टैंडर्ड’ (सर्वश्रेष्ठ तकनीक) है।

इस विधि का मुख्य सिद्धांत यह है कि नवजात शिशु की हड्डियां बहुत नरम (Cartilage जैसी) होती हैं और उनके लिगामेंट्स में बहुत अधिक लचीलापन होता है। पोनसेटी विधि इसी लचीलेपन का लाभ उठाती है। इसमें पैर को धीरे-धीरे सही दिशा में मोड़कर (Manipulation) उस पर प्लास्टर ऑफ पेरिस (POP) का कास्ट लगाया जाता है।

पोनसेटी विधि में CAVE सिद्धांत

इस विधि में पैर की विकृतियों को एक विशिष्ट क्रम में ठीक किया जाता है, जिसे CAVE कहा जाता है:

  1. C – Cavus (केवस): पैर के तलवे का घुमाव (High arch) सबसे पहले ठीक किया जाता है।
  2. A – Adductus (एडक्टस): पैर के पंजों का अंदर की तरफ मुड़ना ठीक किया जाता है।
  3. V – Varus (वेरस): एड़ी का अंदर की तरफ मुड़ना (Inward tilt of heel) सीधा किया जाता है।
  4. E – Equinus (इक्विनस): अंत में, पैर का नीचे की तरफ झुकाव (Tight Achilles Tendon) ठीक किया जाता है।

पोनसेटी विधि से इलाज के चरण (Step-by-Step Procedure)

क्लबफुट का आदर्श इलाज शिशु के जन्म के पहले या दूसरे सप्ताह में ही शुरू कर दिया जाना चाहिए। इसकी पूरी प्रक्रिया निम्नलिखित चरणों में पूरी होती है:

चरण 1: मैनिपुलेशन और सीरियल कास्टिंग (Manipulation and Serial Casting)

डॉक्टर या विशेषज्ञ फिजियोथेरेपिस्ट शिशु के पैर को बहुत ही हल्के हाथों से विशिष्ट दिशा में खींचते (Stretch) हैं। यह प्रक्रिया लगभग 1-2 मिनट तक की जाती है ताकि टाइट लिगामेंट्स खिंच सकें।

  • प्लास्टर लगाना: इसके तुरंत बाद पैर की उंगलियों से लेकर जांघ के ऊपरी हिस्से (Groin) तक प्लास्टर (POP) लगा दिया जाता है।
  • घुटने को 90 डिग्री पर मोड़ना: इस कास्टिंग में घुटने को 90 डिग्री के कोण पर मोड़ा जाता है। इसका बायोमैकेनिकल कारण यह है कि यह पिंडली की मुख्य मांसपेशी (Gastrocnemius) को ढीला कर देता है और शिशु को प्लास्टर को लात मारकर बाहर निकालने से रोकता है।
  • यह प्रक्रिया हर 5 से 7 दिनों में दोहराई जाती है। आमतौर पर पैर को पूरी तरह सीधा करने के लिए 5 से 7 प्लास्टर की आवश्यकता होती है।

चरण 2: अकिलीज़ टेनोटॉमी (Achilles Tenotomy)

लगभग 90% बच्चों में, 5वें या 6ठे प्लास्टर के बाद पैर का आगे का हिस्सा सीधा हो जाता है, लेकिन एड़ी (Heel) अभी भी टाइट अकिलीज़ टेंडन के कारण नीचे की तरफ झुकी रहती है (Equinus)।

  • इसे ठीक करने के लिए एड़ी के पीछे एक बहुत ही छोटा चीरा लगाकर (सिर्फ एक सुई या छोटे ब्लेड से) टेंडन को रिलीज किया जाता है।
  • यह एक माइनर OPD प्रक्रिया है जो लोकल एनेस्थीसिया देकर की जाती है। इसमें टांके लगाने की आवश्यकता नहीं होती है।
  • इसके तुरंत बाद अंतिम प्लास्टर लगाया जाता है, जिसे 3 सप्ताह तक रखा जाता है ताकि कटा हुआ टेंडन अपनी नई, लंबी स्थिति में फिर से जुड़ सके।

चरण 3: ब्रेसिंग (Bracing – Boots and Bar)

प्लास्टर का काम पैर को सीधा करना है, लेकिन ब्रेसिंग का काम उस सीधेपन को बनाए रखना है। यह पूरी प्रक्रिया का सबसे महत्वपूर्ण चरण है।

  • अंतिम प्लास्टर हटने के बाद, बच्चे को एक विशेष प्रकार का जूता पहनाया जाता है, जिसे डेनिस ब्राउन स्प्लिंट (Denis Browne Splint) या फुट एबडक्शन ब्रेस (Foot Abduction Brace) कहते हैं।
  • इसमें दोनों पैरों के जूतों को एक रॉड (Bar) के माध्यम से जोड़ा जाता है, जिसमें प्रभावित पैर को 70 डिग्री बाहर की तरफ (External rotation) सेट किया जाता है।
  • पहनने का नियम: पहले 3 महीनों तक शिशु को यह ब्रेस दिन में 23 घंटे (सिर्फ नहाते समय छोड़कर) पहनाना होता है। इसके बाद, जब तक बच्चा 4-5 साल का नहीं हो जाता, तब तक इसे केवल सोते समय (रात में और दिन की नींद के दौरान – लगभग 12 से 14 घंटे) पहनाया जाता है।

माता-पिता की भूमिका और सावधानियां

पोनसेटी विधि की सफलता पूरी तरह से माता-पिता की प्रतिबद्धता पर निर्भर करती है। प्लास्टर और ब्रेसिंग के दौरान माता-पिता को निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना चाहिए:

  1. प्लास्टर की देखभाल: प्लास्टर को गीला होने से बचाएं। डायपर बदलते समय ध्यान रखें कि प्लास्टर में पेशाब या मल न जाए।
  2. रक्त संचार (Blood Circulation) की जांच: बच्चे के पैर की उंगलियों को नियमित रूप से देखें। उंगलियां गुलाबी होनी चाहिए और दबाने पर तुरंत रंग वापस आना चाहिए (Capillary refill)। यदि उंगलियां नीली, सफेद या सूजी हुई लगें, तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें।
  3. ब्रेसिंग में लापरवाही न करें: इलाज के विफल होने (Relapse) का सबसे बड़ा कारण ब्रेस न पहनाना है। शुरुआत में बच्चा ब्रेस पहनने पर रो सकता है क्योंकि वह असहज महसूस करता है, लेकिन कुछ ही दिनों में उसे इसकी आदत हो जाती है। ब्रेस का नियमित उपयोग ही क्लबफुट को वापस आने से रोकता है।

क्लबफुट के इलाज में फिजियोथेरेपी की भूमिका

प्लास्टर और ब्रेसिंग के बाद, रिहैबिलिटेशन (Rehabilitation) और फिजियोथेरेपी बच्चे के पैरों की सामान्य कार्यक्षमता वापस लाने में अहम भूमिका निभाते हैं:

  • स्ट्रेचिंग (Stretching): जब बच्चा ब्रेस नहीं पहने होता है, तब फिजियोथेरेपिस्ट माता-पिता को एड़ी (Calf muscles) और पैर के तलवे की हल्की स्ट्रेचिंग एक्सरसाइज सिखाते हैं ताकि मांसपेशियां टाइट न हों।
  • मांसपेशियों को मजबूत करना (Strengthening): पैर के बाहरी हिस्से की मांसपेशियों (Peroneal muscles) को मजबूत करना बहुत जरूरी है ताकि वे पैर को अंदर की तरफ मुड़ने से रोक सकें। इसके लिए बच्चे के पैर के बाहरी हिस्से पर गुदगुदी (Tickling) करने जैसी तकनीकें अपनाई जाती हैं, जिससे बच्चा पैर को बाहर की तरफ घुमाता है।
  • चाल का प्रशिक्षण (Gait Training): जब बच्चा चलना शुरू करता है, तो सही फुट प्लेसमेंट और बैलेंसिंग के लिए फिजियोथेरेपी मार्गदर्शन बहुत लाभकारी होता है।

सर्जरी की तुलना में पोनसेटी विधि क्यों बेहतर है?

पुराने समय में की जाने वाली ‘पोस्टीरोमेडियल सॉफ्ट टिश्यू रिलीज’ (PMSTR) जैसी बड़ी सर्जरी के कई नुकसान थे:

  • जोड़ों में अकड़न (Stiffness): सर्जरी वाले पैरों में उम्र बढ़ने के साथ बहुत अधिक अकड़न आ जाती थी।
  • मांसपेशियों की कमजोरी: सर्जरी से पैर की मांसपेशियां कमजोर हो जाती थीं और पैर का आकार छोटा रह जाता था।
  • गठिया (Arthritis): वयस्क होने पर ऐसे मरीजों में जल्दी ऑस्टियोआर्थराइटिस होने का खतरा रहता था।

पोनसेटी विधि से इलाज किए गए पैर जीवन भर लचीले, दर्द रहित और मजबूत रहते हैं। बच्चा दौड़ने, कूदने और खेलों में भाग लेने में पूरी तरह सक्षम होता है।

निष्कर्ष (Conclusion)

क्लबफुट कोई अभिशाप या लाइलाज बीमारी नहीं है। आधुनिक पोनसेटी विधि ने इस जन्मजात विकृति के इलाज में क्रांति ला दी है। बिना किसी चीर-फाड़ और बड़े ऑपरेशन के, केवल प्लास्टर और ब्रेसिंग के माध्यम से बच्चे को पूरी तरह से सामान्य और स्वस्थ पैर दिए जा सकते हैं।

इस पूरी यात्रा में धैर्य और निरंतरता सबसे बड़ी कुंजी है। डॉक्टरों के कौशल के साथ-साथ माता-पिता का समर्पण, विशेष रूप से 4-5 साल की उम्र तक नियमित रूप से ब्रेस पहनाने का संकल्प, बच्चे के सुरक्षित और दर्द-मुक्त भविष्य की नींव रखता है। सही समय पर (जन्म के तुरंत बाद) इलाज शुरू करें और चिकित्सा निर्देशों का कड़ाई से पालन करें; आपका बच्चा भविष्य में सामान्य बच्चों की तरह दौड़ने-भागने में पूरी तरह से सक्षम होगा।

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