डायबिटीज (Diabetes) और फ्रोजन शोल्डर शुगर के मरीजों के कंधे बार-बार जाम क्यों होते हैं
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डायबिटीज (Diabetes) और फ्रोजन शोल्डर शुगर के मरीजों के कंधे बार-बार जाम क्यों होते हैं

डायबिटीज (मधुमेह) एक ऐसी क्रोनिक (दीर्घकालिक) बीमारी है, जो शरीर के किसी एक अंग तक सीमित नहीं रहती। आमतौर पर लोग जानते हैं कि हाई ब्लड शुगर का असर हमारी आंखों (रेटिनोपैथी), किडनी (नेफ्रोपैथी), हृदय और नसों (न्यूरोपैथी) पर पड़ता है। लेकिन, डायबिटीज का एक और बहुत ही दर्दनाक और आम दुष्प्रभाव है, जिस पर अक्सर तब तक ध्यान नहीं दिया जाता, जब तक कि वह रोजमर्रा के कामों को मुश्किल न बना दे। वह है— फ्रोजन शोल्डर (Frozen Shoulder) या कंधे का जाम होना।

मेडिकल भाषा में इसे एडहेसिव कैप्सुलाइटिस (Adhesive Capsulitis) कहा जाता है। एक सामान्य व्यक्ति की तुलना में डायबिटीज के मरीजों में फ्रोजन शोल्डर होने का खतरा 2 से 4 गुना अधिक होता है। सबसे बड़ी परेशानी यह है कि शुगर के मरीजों में यह समस्या न केवल जल्दी होती है, बल्कि ठीक होने में बहुत लंबा समय लेती है और कई बार ठीक होने के बाद दूसरे कंधे में या उसी कंधे में बार-बार लौट आती है।

आइए इस लेख में विस्तार से समझते हैं कि फ्रोजन शोल्डर क्या है, डायबिटीज के मरीजों के कंधे बार-बार क्यों जाम होते हैं, और इससे बचने तथा इसके इलाज के क्या उपाय हैं।

Table of Contents

फ्रोजन शोल्डर (कंधा जाम होना) क्या है?

हमारा कंधा एक ‘बॉल एंड सॉकेट’ (Ball and Socket) जॉइंट है। यह तीन हड्डियों— कॉलरबोन (हंसली), शोल्डर ब्लेड और ऊपरी बांह की हड्डी (ह्यूमरस)— से मिलकर बनता है। इस पूरे जॉइंट को सुरक्षित रखने और इसे आसानी से मूव (हिलाने-डुलाने) करने के लिए इसके चारों ओर एक लचीला ऊतक (टिशू) होता है, जिसे शोल्डर कैप्सूल (Shoulder Capsule) कहते हैं।

जब इस कैप्सूल में सूजन आ जाती है, तो यह मोटा और सख्त होने लगता है। इसके लचीलेपन में कमी आ जाती है और जॉइंट के अंदर मौजूद साइनोवियल फ्लूइड (जोड़ों को चिकनाहट देने वाला तरल पदार्थ) भी कम हो जाता है। इसके परिणामस्वरूप, कंधे को हिलाने पर तेज दर्द होता है और धीरे-धीरे कंधा पूरी तरह से जाम हो जाता है। इसी स्थिति को फ्रोजन शोल्डर कहते हैं।

डायबिटीज के मरीजों में कंधे बार-बार जाम क्यों होते हैं?

डायबिटीज और फ्रोजन शोल्डर के बीच एक गहरा और वैज्ञानिक संबंध है। शुगर के मरीजों में यह समस्या बार-बार उभरने के पीछे मुख्य रूप से शरीर में होने वाले रासायनिक बदलाव जिम्मेदार होते हैं:

1. कोलेजन का ग्लाइकोसिलेशन (Glycosylation of Collagen)

यह फ्रोजन शोल्डर का सबसे प्रमुख कारण है। हमारे जोड़ों, टेंडन और लिगामेंट्स को बनाने में कोलेजन (Collagen) नाम के प्रोटीन की अहम भूमिका होती है। कोलेजन शरीर को संरचना और लचीलापन (flexibility) प्रदान करता है।

जब रक्त में शुगर (ग्लूकोज) का स्तर लंबे समय तक अधिक रहता है, तो ग्लूकोज के अणु सीधे कोलेजन प्रोटीन से चिपकने लगते हैं। इस प्रक्रिया को ग्लाइकोसिलेशन कहा जाता है। जब शुगर कोलेजन से जुड़ जाती है, तो यह कोलेजन को चिपचिपा, सख्त और कड़क बना देती है। इस वजह से शोल्डर कैप्सूल अपना लचीलापन खो देता है और उसमें सिकुड़न आ जाती है। जब भी मरीज अपने ब्लड शुगर को कंट्रोल नहीं कर पाता, यह प्रक्रिया दोबारा शुरू हो जाती है, जिससे कंधा बार-बार जाम होता है।

2. एडवांस ग्लाइकेशन एंड-प्रोडक्ट्स (AGEs) का निर्माण

ग्लाइकोसिलेशन की प्रक्रिया के कारण शरीर में कुछ हानिकारक तत्व बनते हैं, जिन्हें एडवांस ग्लाइकेशन एंड-प्रोडक्ट्स (AGEs) कहा जाता है। ये AGEs शरीर में सूजन (Inflammation) को बढ़ाते हैं। जब कंधे के जॉइंट में लगातार सूजन बनी रहती है, तो वहां स्कार टिशू (खराब ऊतक) बनने लगते हैं। यही स्कार टिशू कंधे की गति को पूरी तरह से रोक देते हैं।

3. रक्त संचार में कमी (Poor Circulation)

डायबिटीज के कारण शरीर की छोटी रक्त वाहिकाएं (Micro blood vessels) क्षतिग्रस्त हो जाती हैं। कंधे के जोड़ों और ऊतकों तक ऑक्सीजन और पोषक तत्व पहुंचाने वाली नसें कमजोर हो जाती हैं। उचित रक्त संचार न होने के कारण अगर कंधे में कोई मामूली चोट या खिंचाव आता है, तो वह जल्दी हील (ठीक) नहीं हो पाता और धीरे-धीरे फ्रोजन शोल्डर का रूप ले लेता है।

4. रोग प्रतिरोधक क्षमता में बदलाव (Altered Immune Response)

हाई ब्लड शुगर शरीर के इम्यून सिस्टम को भी प्रभावित करता है। कई बार शरीर की रोग प्रतिरोधक प्रणाली खुद ही जोड़ों के कैप्सूल पर हमला करने लगती है, जिससे भारी सूजन आ जाती है। डायबिटीज के मरीजों में यह इंफ्लेमेटरी रिस्पॉन्स बहुत तेज होता है, जो कंधे को तेजी से जाम कर देता है।

फ्रोजन शोल्डर के चरण (Stages of Frozen Shoulder)

डायबिटीज के मरीजों में फ्रोजन शोल्डर अचानक से नहीं होता; यह तीन अलग-अलग चरणों में विकसित होता है:

पहला चरण: फ्रीजिंग स्टेज (Freezing Stage)

  • अवधि: यह चरण 2 से 9 महीने तक चल सकता है।
  • लक्षण: कंधे में हल्का-हल्का दर्द शुरू होता है, जो समय के साथ बढ़ता जाता है। रात के समय, विशेषकर करवट लेकर सोने पर दर्द बहुत तेज हो जाता है। कंधे की मूवमेंट (हिलाने की क्षमता) धीरे-धीरे कम होने लगती है। कंघी करना, कपड़े पहनना या पीछे की जेब से वॉलेट निकालना दर्दनाक हो जाता है।

दूसरा चरण: फ्रोजन स्टेज (Frozen Stage)

  • अवधि: यह चरण 4 से 12 महीने तक रह सकता है।
  • लक्षण: इस चरण में दर्द में थोड़ी कमी आ सकती है, लेकिन कंधा पूरी तरह से ‘फ्रीज’ यानी जाम हो जाता है। कंधे का मूवमेंट लगभग खत्म हो जाता है। इस दौरान रोजमर्रा के छोटे-छोटे काम करना भी एक बड़ी चुनौती बन जाता है। डायबिटीज के मरीजों में यह स्टेज काफी लंबी खिंच सकती है।

तीसरा चरण: थॉइंग स्टेज (Thawing Stage)

  • अवधि: इस चरण में 5 महीने से लेकर 2 साल या उससे भी अधिक समय लग सकता है।
  • लक्षण: ‘थॉइंग’ का मतलब है पिघलना या खुलना। इस चरण में कंधे की गति धीरे-धीरे वापस आने लगती है और दर्द लगभग खत्म हो जाता है। हालांकि, अगर ब्लड शुगर अनियंत्रित रहे, तो रिकवरी बहुत धीमी होती है।

डायबिटीज के मरीजों के लिए बचाव और इलाज (Management & Treatment)

फ्रोजन शोल्डर का इलाज एक लंबी प्रक्रिया है और इसमें धैर्य की बहुत जरूरत होती है। डायबिटीज के मरीजों को इसके इलाज में दोहरे मोर्चे पर लड़ना पड़ता है— एक तरफ कंधे का दर्द और दूसरी तरफ ब्लड शुगर।

1. ब्लड शुगर पर सख्त नियंत्रण (Strict Blood Sugar Control)

यह सबसे महत्वपूर्ण कदम है। जब तक ब्लड शुगर लेवल नॉर्मल नहीं होगा, तब तक शरीर में AGEs का बनना बंद नहीं होगा और कोई भी दवा या एक्सरसाइज पूरी तरह से असर नहीं करेगी। अपनी एचबीए1सी (HbA1c) रिपोर्ट पर नजर रखें और इसे 7% के आसपास या डॉक्टर के निर्देशानुसार रखने का प्रयास करें।

2. फिजियोथेरेपी (Physiotherapy)

फ्रोजन शोल्डर को खोलने के लिए मूवमेंट बहुत जरूरी है। एक प्रशिक्षित फिजियोथेरेपिस्ट आपके कंधे की स्थिति के अनुसार स्ट्रेचिंग एक्सरसाइज बता सकता है।

  • पेंडुलम स्ट्रेच (Pendulum Stretch): थोड़ा आगे की ओर झुकें और अपने दर्द वाले हाथ को नीचे की ओर लटकने दें। अब इसे एक पेंडुलम की तरह धीरे-धीरे गोल-गोल घुमाएं।
  • फिंगर वॉक (Finger Walk): दीवार के सामने खड़े हो जाएं। अपने दर्द वाले हाथ की उंगलियों को दीवार पर रखें और धीरे-धीरे उंगलियों की मदद से हाथ को ऊपर की ओर ले जाएं (जैसे उंगलियां दीवार पर चल रही हों)।

(चेतावनी: डायबिटीज के मरीजों को दर्द की सीमा पार करके जबरदस्ती स्ट्रेचिंग नहीं करनी चाहिए, इससे कैप्सूल और फट सकता है।)

3. दवाएं (Medications)

शुरुआती दर्द और सूजन को कम करने के लिए डॉक्टर नॉन-स्टेरॉयडल एंटी-इंफ्लेमेटरी ड्रग्स (NSAIDs) दे सकते हैं। हालांकि, डायबिटीज के मरीजों को दर्द निवारक दवाओं का लंबे समय तक सेवन नहीं करना चाहिए क्योंकि इसका असर किडनी पर पड़ सकता है।

4. कॉर्टिकोस्टेरॉइड इंजेक्शन (Corticosteroid Injections)

अगर दर्द बहुत अधिक है और कंधे में बिल्कुल भी मूवमेंट नहीं है, तो डॉक्टर सीधे कंधे के जॉइंट में स्टेरॉयड का इंजेक्शन लगा सकते हैं। इससे सूजन तुरंत कम होती है और फिजियोथेरेपी करना आसान हो जाता है। ध्यान दें: स्टेरॉयड इंजेक्शन से कुछ दिनों के लिए ब्लड शुगर लेवल अचानक बढ़ सकता है, इसलिए इसे केवल एक्सपर्ट डॉक्टर की निगरानी में ही लेना चाहिए।

5. हाइड्रोडाइलेटेशन (Hydrodilatation)

इस प्रक्रिया में डॉक्टर जॉइंट कैप्सूल के अंदर स्टेराइल वॉटर (Sterile water) और दवाइयों का एक मिश्रण इंजेक्ट करते हैं। इससे कैप्सूल में फैलाव आता है और जो ऊतक सिकुड़ गए थे, वे खुल जाते हैं, जिससे कंधे का मूवमेंट बेहतर होता है।

6. सर्जरी (Arthroscopic Surgery)

अगर कई महीनों के इलाज और फिजियोथेरेपी के बाद भी कंधा नहीं खुलता है, तो बहुत ही दुर्लभ मामलों में सर्जरी का सहारा लिया जाता है। इसमें दूरबीन (आर्थ्रोस्कोप) की मदद से स्कार टिशू को काटकर निकाल दिया जाता है।

निष्कर्ष (Conclusion)

डायबिटीज के मरीजों में फ्रोजन शोल्डर एक बेहद तकलीफदेह स्थिति है, जो न केवल शारीरिक रूप से बल्कि मानसिक रूप से भी मरीज को थका देती है। बार-बार कंधे का जाम होना इस बात का स्पष्ट संकेत है कि शरीर में ब्लड शुगर का स्तर लगातार ऊंच-नीच का शिकार हो रहा है और ग्लाइकोसिलेशन की प्रक्रिया अंदर ही अंदर ऊतकों को नुकसान पहुंचा रही है।

अगर आपको डायबिटीज है और आपके कंधे में हल्का सा भी दर्द या जकड़न महसूस हो रही है, तो इसे ‘सोने के गलत तरीके’ या ‘थकान’ का नाम देकर नजरअंदाज न करें। तुरंत अपने डॉक्टर और फिजियोथेरेपिस्ट से मिलें। समय रहते ब्लड शुगर को नियंत्रित करना और सही व्यायाम शुरू करना ही आपको इस असहनीय दर्द से बचा सकता है। याद रखें, आपका शुगर लेवल जितना संतुलित रहेगा, आपके जोड़ उतने ही लचीले और स्वस्थ रहेंगे।

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