मैराथन के दौरान धावकों में ‘हीट स्ट्रोक’ (Heat Stroke) की पहचान और आइस-इमर्शन (बर्फ के पानी) का उपयोग
मैराथन दौड़ना आज के समय में केवल एक खेल या शौक नहीं रह गया है, बल्कि यह शारीरिक फिटनेस, मानसिक दृढ़ता और सहनशक्ति का एक प्रमुख प्रतीक बन चुका है। दुनियाभर में हर साल लाखों लोग मैराथन, हाफ मैराथन और अल्ट्रा-मैराथन में हिस्सा लेते हैं। लेकिन इस जबरदस्त शारीरिक चुनौती के साथ कई गंभीर स्वास्थ्य जोखिम भी जुड़े होते हैं। इनमें से सबसे खतरनाक, जानलेवा और आपातकालीन चिकित्सा स्थिति है ‘एक्सर्शनल हीट स्ट्रोक’ (Exertional Heat Stroke – EHS)।
जब कोई धावक अत्यधिक गर्मी और उमस (Humidity) में दौड़ता है, तो उसके शरीर का तापमान खतरनाक स्तर तक बढ़ सकता है। यदि समय पर इस स्थिति की पहचान न की जाए और त्वरित इलाज न मिले, तो यह स्थिति अंगों की विफलता (Organ failure), मस्तिष्क को स्थायी नुकसान और यहां तक कि मृत्यु का कारण भी बन सकती है। इस लेख में हम विस्तार से समझेंगे कि मैराथन के दौरान धावकों में हीट स्ट्रोक की पहचान कैसे की जाती है और इसके सबसे प्रभावी प्राथमिक उपचार—आइस-इमर्शन (बर्फ के पानी में डुबाना)—का उपयोग कैसे, कब और क्यों किया जाता है।
हीट स्ट्रोक (Heat Stroke) क्या है?
हीट स्ट्रोक को समझने से पहले हमें शरीर की तापमान नियंत्रण प्रणाली (Thermoregulatory System) को समझना होगा। दौड़ते समय, धावक की मांसपेशियां भारी मात्रा में ऊर्जा उत्पन्न करती हैं, जिसका लगभग 70-80% हिस्सा गर्मी (Heat) में बदल जाता है। सामान्य परिस्थितियों में, हमारा शरीर पसीना बहाकर (Sweating) और त्वचा के पास रक्त प्रवाह बढ़ाकर (Vasodilation) इस अतिरिक्त गर्मी को बाहर निकाल देता है।
लेकिन, जब कोई धावक अत्यधिक गर्म और नम (Humid) वातावरण में अपनी शारीरिक क्षमता की सीमा तक दौड़ता है, तो पसीने के वाष्पीकरण (Evaporation) की प्रक्रिया धीमी हो जाती है। नमी के कारण पसीना सूखता नहीं है, जिससे शरीर गर्मी बाहर निकालने में पूरी तरह असमर्थ हो जाता है। जब शरीर का कोर तापमान (Core Body Temperature) 40°C (104°F) या उससे अधिक हो जाता है और इसके साथ केंद्रीय तंत्रिका तंत्र (Central Nervous System) प्रभावित होने लगता है, तो इसे एक्सर्शनल हीट स्ट्रोक कहा जाता है।
हीट स्ट्रोक की पहचान और प्रमुख लक्षण
हीट स्ट्रोक की पहचान करना सबसे महत्वपूर्ण और पहला कदम है। अक्सर लोग और यहां तक कि कुछ अनुभवहीन मेडिकल वालंटियर भी इसे सामान्य थकावट या ‘हीट एग्जॉर्शन’ (Heat Exhaustion) समझने की भूल कर बैठते हैं। हीट एग्जॉर्शन और हीट स्ट्रोक के बीच सबसे बड़ा अंतर मस्तिष्क और तंत्रिका तंत्र पर पड़ने वाला प्रभाव है।
धावकों में हीट स्ट्रोक के निम्नलिखित प्रमुख लक्षण देखे जाते हैं:
- केंद्रीय तंत्रिका तंत्र (CNS) में गंभीर गड़बड़ी: यह हीट स्ट्रोक का सबसे स्पष्ट संकेत है। धावक भ्रमित (Confused) हो सकता है, अजीबोगरीब व्यवहार कर सकता है, आक्रामक (Aggressive) हो सकता है, या उसे चक्कर आ सकते हैं। गंभीर मामलों में धावक बेहोश होकर गिर सकता है या उसे दौरे (Seizures) पड़ सकते हैं।
- शरीर का तापमान: शरीर का कोर तापमान 40°C (104°F) के पार चला जाता है। (ध्यान दें: सटीक तापमान मापने के लिए रेक्टल थर्मामीटर का उपयोग किया जाता है, क्योंकि त्वचा या कान के थर्मामीटर सटीक रीडिंग नहीं देते)।
- त्वचा की स्थिति: हालांकि क्लासिक हीट स्ट्रोक (जो बुजुर्गों में होता है) में पसीना आना बंद हो जाता है और त्वचा सूखी व गर्म हो जाती है, लेकिन एक्सर्शनल हीट स्ट्रोक वाले धावकों की त्वचा पर अक्सर बहुत पसीना होता है। इसलिए, ‘पसीना आना’ यह नहीं दर्शाता कि धावक सुरक्षित है।
- हृदय गति और सांसें: नाड़ी का बहुत तेज चलना (Tachycardia) और तेजी से उथली सांसें लेना (Hyperventilation)।
- गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल लक्षण: उल्टी आना, मतली महसूस होना या दस्त लगना।
- शारीरिक संतुलन खोना: दौड़ते समय लड़खड़ाना, सीधे न चल पाना या अचानक घुटनों के बल गिर जाना (Collapse)।
चिकित्सा का स्वर्णिम नियम: “पहले ठंडा करें, फिर अस्पताल ले जाएं” (Cool First, Transport Second)
हीट स्ट्रोक एक भयंकर आपातकाल है। खेल चिकित्सा (Sports Medicine) में इसके लिए एक स्पष्ट और कड़ा नियम है: “Cool First, Transport Second”।
इसका सीधा अर्थ है कि अगर किसी धावक को हीट स्ट्रोक हुआ है, तो उसे तुरंत एम्बुलेंस में डालकर अस्पताल ले जाने की जल्दबाजी नहीं करनी चाहिए। एम्बुलेंस में शरीर को तेजी से ठंडा करने की सुविधा नहीं होती। यदि शरीर का तापमान 30-45 मिनट से अधिक समय तक 40°C (104°F) से ऊपर रहता है, तो मस्तिष्क, लीवर और किडनी की कोशिकाएं मरने लगती हैं। इसलिए, मेडिकल टेंट में मौके पर ही शरीर का तापमान कम करना सबसे ज्यादा जरूरी है। तापमान सुरक्षित स्तर पर आने के बाद ही मरीज को अस्पताल स्थानांतरित किया जाना चाहिए।
आइस-इमर्शन (Cold Water Immersion – CWI): जीवन रक्षक तकनीक
हीट स्ट्रोक के इलाज के लिए ‘गोल्ड स्टैंडर्ड’ या सबसे बेहतरीन और वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित तरीका आइस-इमर्शन (बर्फ के पानी में डुबाना) है।
यह कैसे काम करता है?
पानी, हवा की तुलना में 20 से 25 गुना अधिक तेजी से ऊष्मा (Heat) सोखता है। जब एक अत्यधिक गर्म शरीर को बर्फ और पानी के ठंडे मिश्रण में डुबाया जाता है, तो चालन (Conduction) और संवहन (Convection) के माध्यम से शरीर की गर्मी तेजी से पानी में स्थानांतरित होने लगती है। यह विधि शरीर के तापमान को लगभग 0.15°C से 0.35°C प्रति मिनट की दर से कम कर सकती है, जो किसी भी अन्य विधि (जैसे पंखा चलाना, बर्फ के पैक रखना या ठंडे पानी की पट्टियां रखना) से कहीं अधिक तेज है।
आइस-इमर्शन की चरण-दर-चरण प्रक्रिया
मैराथन के मेडिकल टेंट में आइस-इमर्शन को लागू करने की एक विशिष्ट और पेशेवर प्रक्रिया होती है:
- टब की व्यवस्था: मेडिकल टेंट में बड़े प्लास्टिक के टब (Kiddie pools या Stock tanks) पहले से तैयार रखे जाते हैं। इनमें आधा पानी भरा होता है और पास में बर्फ के बड़े कूलर रखे जाते हैं।
- मिश्रण तैयार करना: जैसे ही हीट स्ट्रोक के संदिग्ध धावक को लाया जाता है, टब में बर्फ डाल दी जाती है। पानी का तापमान आदर्श रूप से 2°C से 15°C (35°F – 59°F) के बीच होना चाहिए।
- धावक को डुबाना: धावक के अतिरिक्त कपड़े हटा दिए जाते हैं और उसे सावधानीपूर्वक टब में बैठाया या लिटाया जाता है। पानी धावक की गर्दन तक होना चाहिए (ताकि धड़ और अंग पूरी तरह डूबे रहें), लेकिन सिर पानी से बाहर रहना चाहिए। एक मेडिकल कर्मचारी को धावक के सिर को सहारा देना चाहिए ताकि वह बेहोशी की हालत में पानी में न डूब जाए।
- पानी को हिलाना (Water Agitation): यह एक अत्यंत महत्वपूर्ण कदम है। जब धावक को ठंडे पानी में डाला जाता है, तो उसके शरीर की गर्मी से उसके शरीर के ठीक आस-पास का पानी गर्म हो जाता है, जिससे एक ‘गर्म पानी की परत’ (Thermal boundary layer) बन जाती है। कूलिंग को तेज करने के लिए, मेडिकल टीम को लगातार टब के पानी को हाथों या तौलिये से जोर-जोर से हिलाते रहना चाहिए ताकि बर्फ का ठंडा पानी लगातार त्वचा के संपर्क में आता रहे।
- तापमान की निगरानी: इमर्शन के दौरान धावक के मुख्य तापमान (Core temperature) की लगातार निगरानी की जाती है। खेल चिकित्सा में इसके लिए रेक्टल थर्मामीटर (Rectal Thermometer) का उपयोग किया जाता है, क्योंकि यह शरीर के आंतरिक तापमान का सबसे सटीक माप देता है।
- टब से बाहर निकालना: धावक को टब से तब बाहर निकाला जाता है जब उसके शरीर का कोर तापमान गिरकर 38.9°C (102°F) तक आ जाए। इसे 37°C तक गिरने का इंतजार नहीं किया जाता, क्योंकि टब से बाहर निकालने के बाद भी शरीर का तापमान कुछ देर तक गिरता रहता है (इसे ‘After-drop’ कहते हैं)। यदि उसे और अधिक देर तक रखा गया, तो हाइपोथर्मिया (Hypothermia) का खतरा हो सकता है।
विकल्प: TACO विधि (Tarp-Assisted Cooling with Oscillation)
यदि बड़े टब उपलब्ध नहीं हैं या किसी दुर्गम स्थान पर इमरजेंसी होती है, तो TACO विधि का उपयोग किया जाता है। इसमें धावक को एक बड़ी प्लास्टिक की तिरपाल (Tarp) के बीच में लिटाया जाता है। 4-6 लोग तिरपाल के किनारों को पकड़कर उसे एक ‘झूले’ या ‘बाथटब’ का आकार देते हैं। फिर उसमें बर्फ और पानी डाल दिया जाता है और किनारों को हिलाकर पानी को शरीर पर घुमाया जाता है। यह विधि भी टब इमर्शन जितनी ही प्रभावी साबित हुई है।
रोकथाम और सावधानियां (Prevention Strategies)
हालाँकि आइस-इमर्शन एक बेहतरीन जीवन-रक्षक उपाय है, लेकिन सबसे अच्छी रणनीति हीट स्ट्रोक को होने से रोकना है। धावकों और आयोजकों को निम्नलिखित सावधानियां बरतनी चाहिए:
- पर्यावरणीय जागरूकता (WBGT Index): रेस आयोजकों को वेट-बल्ब ग्लोब टेम्परेचर (WBGT) का उपयोग करना चाहिए, जो तापमान, आर्द्रता, हवा की गति और सौर विकिरण को मापता है। यदि WBGT खतरनाक स्तर पर है, तो रेस को रद्द करना, समय बदलना या दूरी कम करना आवश्यक है।
- अनुकूलन (Acclimatization): धावकों को रेस से कम से कम 10-14 दिन पहले गर्म मौसम में दौड़ने का अभ्यास करना चाहिए ताकि उनका शरीर गर्मी के प्रति अभ्यस्त हो जाए।
- उचित हाइड्रेशन: दौड़ के दौरान प्यास के अनुसार पानी और इलेक्ट्रोलाइट्स का सेवन करना चाहिए। हालांकि, बहुत अधिक पानी पीना (Overhydration) भी ‘हाइपोनेट्रेमिया’ जैसी अन्य जानलेवा स्थिति पैदा कर सकता है, इसलिए संतुलन जरूरी है।
- अपनी गति को पहचानना (Pacing): धावकों को मौसम के अनुसार अपनी गति कम करनी चाहिए। अत्यधिक गर्मी में व्यक्तिगत सर्वश्रेष्ठ (Personal Best) समय के लिए दौड़ना खतरनाक हो सकता है।
निष्कर्ष
मैराथन दौड़ना मानवीय दृढ़ संकल्प का एक अद्भुत प्रदर्शन है, लेकिन प्रकृति और मानव शरीर विज्ञान (Physiology) के नियमों की अनदेखी जानलेवा साबित हो सकती है। एक्सर्शनल हीट स्ट्रोक एक 100% जीवित रहने योग्य स्थिति है यदि इसे तुरंत पहचाना जाए और तुरंत इलाज किया जाए।
मैराथन आयोजकों, मेडिकल टीमों और यहां तक कि साथी धावकों को यह पता होना चाहिए कि किसी के लड़खड़ाने, भ्रमित होने या गिरने पर तुरंत क्या करना है। ‘पहले ठंडा करें, फिर अस्पताल ले जाएं’ की नीति और आइस-इमर्शन का सही उपयोग हर साल कई धावकों की जान बचाता है। सही तैयारी, जागरूकता और समय पर की गई चिकित्सा कार्रवाई ही किसी भी मैराथन को एक सुरक्षित और सफल आयोजन बनाती है।
