क्या प्लेट या रॉड (Implant) डलने के बाद फिजियोथेरेपी सुरक्षित है?
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क्या प्लेट या रॉड (Implant) डलने के बाद फिजियोथेरेपी सुरक्षित है? – पूरी जानकारी

हड्डी टूटने (Fracture) के बाद जब स्थिति गंभीर होती है, तो डॉक्टर सर्जरी के माध्यम से प्लेट, रॉड, पेंच (Screws) या कील (Nails) डालकर हड्डी को अपनी सही जगह पर फिक्स करते हैं। इस सर्जिकल प्रक्रिया को मेडिकल भाषा में ORIF (Open Reduction and Internal Fixation) कहा जाता है।

सर्जरी के बाद मरीजों और उनके परिजनों के मन में सबसे बड़ा और आम सवाल यही होता है कि: “क्या शरीर के अंदर धातु (Metal) की प्लेट या रॉड होने पर फिजियोथेरेपी करवाना सुरक्षित है? कहीं कसरत करने से प्लेट टूट तो नहीं जाएगी या अपनी जगह से खिसक तो नहीं जाएगी?”

इसका सीधा और स्पष्ट जवाब है: हां, यह पूरी तरह से सुरक्षित है। बल्कि, सर्जरी के बाद अपनी सामान्य दिनचर्या में लौटने और 100% रिकवरी के लिए फिजियोथेरेपी केवल सुरक्षित ही नहीं, बल्कि अनिवार्य है। आइए इस विषय पर विस्तार से चर्चा करते हैं और समझते हैं कि इम्प्लांट डलने के बाद फिजियोथेरेपी क्यों जरूरी है और यह कैसे काम करती है।

इम्प्लांट (प्लेट/रॉड) का मुख्य काम क्या है?

सर्जरी के दौरान इस्तेमाल किए जाने वाले इम्प्लांट्स (जैसे टाइटेनियम या स्टेनलेस स्टील की प्लेट और रॉड) बेहद मजबूत होते हैं। इनका मुख्य उद्देश्य टूटी हुई हड्डी के हिस्सों को एक साथ मजबूती से पकड़ कर रखना होता है ताकि वे हिलें नहीं और हड्डी प्राकृतिक रूप से जुड़ सके।

यह समझना जरूरी है कि प्लेट या रॉड आपके शरीर का स्थायी हिस्सा बनने के लिए नहीं होते हैं (हालांकि कई बार इन्हें उम्र भर निकाला नहीं जाता), बल्कि ये हड्डी को तब तक सहारा देते हैं जब तक कि वह खुद वजन सहने लायक मजबूत न हो जाए। चूंकि हड्डी को एक जगह फिक्स कर दिया जाता है, इसलिए आस-पास की मांसपेशियां, टेंडन और जोड़ बहुत जल्दी अकड़ (Stiff) जाते हैं। यहीं से फिजियोथेरेपी की भूमिका शुरू होती है।

क्या फिजियोथेरेपी से इम्प्लांट को नुकसान पहुंच सकता है?

यह एक बहुत बड़ा भ्रम (Myth) है। एक योग्य और प्रोफेशनल फिजियोथेरेपिस्ट मानव शरीर की एनाटॉमी (Anatomy) और बायोमैकेनिक्स (Biomechanics) का विशेषज्ञ होता है।

  • मेडिकल गाइडलाइन्स का पालन: आपका फिजियोथेरेपिस्ट आपके ऑर्थोपेडिक सर्जन की रिपोर्ट और एक्स-रे (X-ray) का बारीकी से अध्ययन करता है। उन्हें पता होता है कि हड्डी कितनी जुड़ी है, इम्प्लांट किस स्थिति में है, और उस पर कितना दबाव (Weight-bearing) डाला जा सकता है।
  • सुरक्षित मूवमेंट: कसरत के दौरान, फिजियोथेरेपिस्ट यह सुनिश्चित करता है कि मूवमेंट केवल जोड़ (Joint) और मांसपेशियों (Muscles) पर हो, न कि उस जगह पर जहां हड्डी अभी जुड़ रही है।
  • प्लेट खिसकने का डर: आधुनिक इम्प्लांट्स को हड्डियों में विशेष पेंचों (Locking screws) के जरिए बहुत मजबूती से कसा जाता है। सामान्य और निर्देशित फिजियोथेरेपी व्यायाम से इनके खिसकने या टूटने का कोई खतरा नहीं होता है।

प्लेट या रॉड डलने के बाद फिजियोथेरेपी के मुख्य फायदे

सर्जरी के बाद केवल आराम करना आपकी रिकवरी को धीमा कर सकता है और स्थायी विकलांगता (जैसे जोड़ का हमेशा के लिए जाम हो जाना) का कारण बन सकता है। फिजियोथेरेपी के निम्नलिखित महत्वपूर्ण लाभ हैं:

1. दर्द और सूजन (Pain and Swelling) में कमी

सर्जरी के बाद उस हिस्से में भारी सूजन और दर्द होना आम है। फिजियोथेरेपिस्ट क्रायोथेरेपी (बर्फ का सेंक), एलिवेशन (हिस्से को ऊपर रखना), और कुछ विशेष इलेक्ट्रोथेरेपी मशीनों (जैसे TENS या IFT) का उपयोग करके दर्द और सूजन को प्राकृतिक रूप से कम करते हैं।

2. जोड़ों की अकड़न (Joint Stiffness) को रोकना

जब हड्डी को रॉड या प्लेट से फिक्स किया जाता है, तो डॉक्टर उस हिस्से को प्लास्टर या ब्रेस से कुछ हफ्तों के लिए स्थिर कर देते हैं। इस स्थिरता के कारण आस-पास के जोड़ जाम होने लगते हैं। उदाहरण के लिए, यदि जांघ की हड्डी (Femur) में रॉड डली है, तो घुटना (Knee) जाम होने लगता है। फिजियोथेरेपी के जरिए धीरे-धीरे इन जोड़ों की रेंज ऑफ मोशन (ROM) वापस लाई जाती है।

3. मांसपेशियों को मजबूत बनाना (Muscle Strengthening)

चोट के बाद जब हम किसी अंग का उपयोग नहीं करते हैं, तो वहां की मांसपेशियां बहुत तेजी से सिकुड़ने और कमजोर होने लगती हैं (Muscle Atrophy)। फिजियोथेरेपी में आइसोमेट्रिक (Isometric) और स्ट्रेंथनिंग एक्सरसाइज के जरिए मांसपेशियों की ताकत वापस लौटाई जाती है, ताकि वे इम्प्लांट और हड्डी को सही सपोर्ट दे सकें।

4. खून के थक्के (DVT) से बचाव

सर्जरी के बाद लंबे समय तक बिस्तर पर पड़े रहने से पैरों की नसों में खून के थक्के (Deep Vein Thrombosis) बनने का खतरा रहता है, जो जानलेवा हो सकता है। फिजियोथेरेपिस्ट आपको शुरुआत से ही एंकल पंप (Ankle Toe Movements) जैसी हल्की कसरतें करवाते हैं, जिससे रक्त संचार सुचारू रहता है।

5. चलने का सही तरीका (Gait Training)

पैर या कूल्हे की सर्जरी के बाद मरीज अक्सर लंगड़ा कर चलने लगता है या चलने में डरता है। वॉकर (Walker) या बैसाखी (Crutches) के सही इस्तेमाल से लेकर, बिना किसी सहारे के एकदम सीधा और सही चलने (Normal Gait) तक का सफर फिजियोथेरेपिस्ट की देखरेख में ही पूरा होता है।

पोस्ट-सर्जरी फिजियोथेरेपी के विभिन्न चरण (Phases of Recovery)

फिजियोथेरेपी एक ही दिन में सब कुछ ठीक करने का जादू नहीं है। इसके लिए मरीज में भी पूरी लगन और ‘समर्पण’ की भावना होनी चाहिए। यह प्रक्रिया मुख्य रूप से तीन चरणों में काम करती है:

चरण 1: सर्जरी के तुरंत बाद (Acute Phase – 1 से 2 सप्ताह) इस चरण में मुख्य फोकस दर्द को कम करने, सूजन घटाने और घाव (Incision) को सुरक्षित रखने पर होता है।

  • हल्के मूवमेंट (Active-assisted ROM)।
  • आइसोमेट्रिक व्यायाम (बिना जोड़ हिलाए मांसपेशियों को सिकोड़ना)।
  • सर्जरी वाले हिस्से के आस-पास के अन्य जोड़ों को चलाना (जैसे घुटने की सर्जरी के बाद पंजे को चलाना)।

चरण 2: रिकवरी और मोबिलिटी (Sub-acute Phase – 3 से 6 सप्ताह) जब एक्स-रे में हड्डी जुड़ने के शुरुआती संकेत (Callus formation) दिखने लगते हैं, तब व्यायाम का स्तर बढ़ाया जाता है।

  • जॉइंट की पूरी रेंज वापस लाने पर काम।
  • हल्का वजन डालना (Partial Weight Bearing) – यह पूरी तरह से सर्जन की सलाह पर निर्भर करता है।
  • मांसपेशियों को स्ट्रेच (Stretch) करना।

चरण 3: मजबूती और सामान्य जीवन (Strengthening Phase – 6 सप्ताह के बाद) इस चरण में हड्डी काफी हद तक जुड़ चुकी होती है और इम्प्लांट पर से दबाव कम हो जाता है।

  • रेजिस्टेंस बैंड (Resistance bands) और वजन (Weights) के साथ व्यायाम।
  • बैलेंस और प्रोप्रियोसेप्शन (Balance training) एक्सरसाइज।
  • व्यक्ति को उसके काम या खेल (Sports) के लिए दोबारा तैयार करना।

फिजियोथेरेपी के दौरान रखी जाने वाली सावधानियां

हालांकि फिजियोथेरेपी सुरक्षित है, लेकिन कुछ सावधानियों का पालन करना अत्यंत आवश्यक है:

  1. खुद से डॉक्टर न बनें: इंटरनेट या यूट्यूब देखकर खुद से कसरत करने का प्रयास न करें। हर मरीज की सर्जरी, फ्रैक्चर का प्रकार और इम्प्लांट अलग होता है। जो कसरत किसी एक के लिए फायदेमंद है, वह आपके लिए नुकसानदेह हो सकती है।
  2. दर्द का सम्मान करें: कसरत करते समय हल्का खिंचाव या मामूली दर्द सामान्य है, लेकिन अगर कोई कसरत करते समय अचानक तेज और चुभने वाला दर्द (Sharp shooting pain) हो, तो तुरंत रुक जाएं और अपने थेरेपिस्ट को बताएं।
  3. वजन डालने के नियम (Weight Bearing Status): जब तक आपका सर्जन पूरी तरह से वजन डालने (Full Weight Bearing) की अनुमति न दे, तब तक वॉकर या बैसाखी का उपयोग न छोड़ें।
  4. निरंतरता बनाए रखें: फिजियोथेरेपी एक क्रमिक प्रक्रिया है। एक या दो दिन में चमत्कार की उम्मीद न करें। नियमितता ही सफलता की कुंजी है।

कुछ भ्रांतियां और तथ्य (Myths vs Facts)

  • भ्रांति: जब तक प्लेट अंदर है, मुझे दर्द रहेगा। तथ्य: प्लेट से दर्द नहीं होता। दर्द सर्जरी के बाद के स्कार टिशू (Scar tissue) और मांसपेशियों की कमजोरी से होता है, जिसे फिजियोथेरेपी से पूरी तरह खत्म किया जा सकता है।
  • भ्रांति: मालिश करने से हड्डी जल्दी जुड़ेगी। तथ्य: फ्रैक्चर वाली जगह पर या इम्प्लांट के ऊपर कभी भी देसी मालिश (Massage) नहीं करवानी चाहिए। इससे ‘मायोसाइटिस ओसिफिकेंस’ (Myositis Ossificans) नामक गंभीर स्थिति पैदा हो सकती है, जहां मांसपेशियों के अंदर हड्डी बनने लगती है। हमेशा वैज्ञानिक फिजियोथेरेपी को चुनें।

निष्कर्ष

प्लेट या रॉड (Implant) डलने के बाद फिजियोथेरेपी न केवल पूरी तरह से सुरक्षित है, बल्कि आपके अंग की खोई हुई कार्यक्षमता को वापस लाने का एकमात्र वैज्ञानिक तरीका है। आधुनिक ऑर्थोपेडिक सर्जरी और एडवांस फिजियोथेरेपी एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। सर्जन हड्डी को जोड़ता है, और फिजियोथेरेपिस्ट उस हड्डी और जुड़े हुए अंगों में जान फूंकने का काम करता है।

अगर आपकी या आपके किसी परिचित की हाल ही में कोई फ्रैक्चर की सर्जरी हुई है, तो बिना किसी डर के आज ही किसी प्रमाणित और अनुभवी फिजियोथेरेपिस्ट से संपर्क करें। सही मार्गदर्शन, सही व्यायाम और आपके खुद के समर्पण से आप बहुत जल्द अपने पैरों पर पहले की तरह मजबूती से खड़े हो सकेंगे।

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