रुमेटीइड अर्थराइटिस (गठिया बाय) में जब जोड़ों में तेज सूजन हो, तो फिजियोथेरेपी कैसे करें?
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रुमेटीइड अर्थराइटिस (गठिया बाय) के एक्यूट फ्लेयर-अप (तेज सूजन) में फिजियोथेरेपी प्रबंधन

रुमेटीइड अर्थराइटिस (Rheumatoid Arthritis – RA), जिसे आम बोलचाल में गठिया बाय भी कहा जाता है, एक ऑटोइम्यून (Autoimmune) और क्रोनिक इन्फ्लेमेटरी (Chronic Inflammatory) बीमारी है। यह मुख्य रूप से हमारे शरीर के जोड़ों की साइनोवियल झिल्ली (Synovial membrane) को प्रभावित करती है। इस बीमारी में मरीजों को अक्सर ‘फ्लेयर-अप’ (Flare-up) का सामना करना पड़ता है—यह वह अवस्था है जब जोड़ों में अचानक बहुत तेज दर्द, लालिमा, गर्माहट और भारी सूजन आ जाती है।

एक फिजियोथेरेपिस्ट के रूप में, इस ‘एक्यूट’ (Acute) या तीव्र अवस्था में मरीज का इलाज करना एक चुनौतीपूर्ण कार्य होता है। जब जोड़ों में तेज सूजन हो, तो फिजियोथेरेपी का मुख्य उद्देश्य मांसपेशियों को मजबूत करना नहीं, बल्कि जोड़ों को और अधिक नुकसान से बचाना, दर्द को कम करना और सूजन को नियंत्रित करना होता है।

इस लेख में हम विस्तार से जानेंगे कि रुमेटीइड अर्थराइटिस में तेज सूजन के दौरान फिजियोथेरेपी का सही प्रोटोकॉल क्या होना चाहिए, कौन सी सावधानियां बरतनी चाहिए और मरीज को क्या सलाह देनी चाहिए।


एक्यूट फ्लेयर-अप (Acute Flare-up) को समझना

जब रुमेटीइड अर्थराइटिस सक्रिय अवस्था में होता है, तो प्रतिरक्षा प्रणाली (Immune system) जोड़ों पर आक्रामक रूप से हमला करती है। इससे जोड़ों के अंदर तरल पदार्थ भर जाता है, जिससे तेज सूजन (Swelling) और जकड़न (Stiffness) होती है, विशेषकर सुबह के समय (Morning Stiffness) जो एक घंटे से अधिक समय तक रह सकती है।

इस दौरान जोड़ अत्यधिक संवेदनशील होते हैं और किसी भी प्रकार का आक्रामक (Aggressive) व्यायाम या स्ट्रेचिंग जोड़ों के कैप्सूल और लिगामेंट्स (Ligaments) को स्थायी नुकसान पहुंचा सकती है। इसलिए, इस चरण में फिजियोथेरेपी का दृष्टिकोण ‘सुरक्षात्मक’ (Protective) और ‘प्रशामक’ (Palliative) होना चाहिए।


तेज सूजन के दौरान फिजियोथेरेपी के मुख्य उद्देश्य (Goals of Physiotherapy)

  1. दर्द और सूजन को कम करना (Pain and Edema Management): सबसे पहली प्राथमिकता मरीज को दर्द से राहत दिलाना है।
  2. जोड़ों की सुरक्षा (Joint Protection): जोड़ों को विकृत (Deformity) होने से बचाना।
  3. मांसपेशियों के नुकसान को रोकना (Prevent Muscle Atrophy): बिना जोड़ों पर जोर डाले मांसपेशियों की ताकत को बनाए रखना।
  4. जकड़न रोकना (Prevent Contractures): जोड़ों को जाम होने से बचाना और मूवमेंट की रेंज (Range of Motion – ROM) को सुरक्षित रखना।

इलाज के तरीके और तकनीक (Treatment Modalities & Techniques)

जब सूजन बहुत तेज हो, तो निम्नलिखित फिजियोथेरेपी तकनीकों का उपयोग किया जाना चाहिए:

1. क्रायोथेरेपी (Cryotherapy / Cold Therapy)

एक्यूट सूजन में ‘कोल्ड पैक’ (Cold Pack) या आइसिंग सबसे प्रभावी इलेक्ट्रोफिजिकल एजेंट (EPA) है।

  • कार्यप्रणाली: बर्फ रक्त वाहिकाओं को सिकोड़ देती है (Vasoconstriction), जिससे जोड़ों में रक्त का प्रवाह कम हो जाता है और सूजन व लालिमा में तुरंत कमी आती है। यह नसों की संवेदनशीलता को कम करके प्राकृतिक दर्द निवारक का काम करती है।
  • कैसे करें: एक तौलिये में आइस पैक लपेटकर प्रभावित जोड़ पर 10 से 15 मिनट के लिए दिन में 3-4 बार लगाएं।
  • सावधानी: बर्फ को सीधे त्वचा पर न लगाएं, इससे आइस बर्न (Ice burn) हो सकता है।

2. इलेक्ट्रोथेरेपी (Electrotherapy)

दर्द को प्रबंधित करने के लिए कुछ मशीनें बहुत उपयोगी होती हैं, लेकिन उनका चयन सावधानी से करना चाहिए।

  • TENS (Transcutaneous Electrical Nerve Stimulation): दर्द कम करने के लिए TENS एक बेहतरीन और सुरक्षित उपकरण है। यह नसों के माध्यम से मस्तिष्क तक जाने वाले दर्द के संकेतों को रोकता है (Pain Gate Theory) और एंडोर्फिन (प्राकृतिक दर्द निवारक हार्मोन) के स्राव को बढ़ाता है।
  • क्या न करें (Contraindication): एक्यूट सूजन के दौरान किसी भी प्रकार की हीट थेरेपी (Heat Therapy) जैसे कि शॉर्ट वेव डायथर्मी (SWD), माइक्रोवेव डायथर्मी (MWD), हॉट पैक (Hot Packs), या वैक्स बाथ (Wax Bath) का उपयोग बिल्कुल न करें। गर्मी रक्त प्रवाह को बढ़ाती है, जिससे सूजन और दर्द और अधिक भड़क सकते हैं। अल्ट्रासाउंड (Ultrasound) का भी थर्मल मोड में उपयोग वर्जित है।

3. स्प्लिंटिंग और ऑर्थोटिक्स (Splinting and Orthotics)

तेज सूजन के समय जोड़ अस्थिर (Unstable) हो जाते हैं। ऐसे में जोड़ों को सही अलाइनमेंट (Alignment) में रखना बहुत जरूरी है।

  • रेस्टिंग स्प्लिंट्स (Resting Splints): कलाई (Wrist) और हाथों के जोड़ों के लिए रेस्टिंग स्प्लिंट्स का उपयोग किया जाता है। यह जोड़ों को एक आरामदायक और न्यूट्रल स्थिति में रखता है, जिससे टेंडन और कैप्सूल पर अनावश्यक खिंचाव नहीं पड़ता।
  • इसका उपयोग विशेष रूप से रात में सोते समय किया जाना चाहिए ताकि सुबह की जकड़न और दर्द को कम किया जा सके और डिफॉर्मिटी (जैसे Swan Neck या Boutonniere deformity) से बचा जा सके।

व्यायाम का सही तरीका (Exercise Prescription during Flare-up)

गठिया बाय के मरीजों में यह भ्रांति होती है कि सूजन के समय बिल्कुल व्यायाम नहीं करना चाहिए, जो कि गलत है। पूर्ण आराम (Complete bed rest) से मांसपेशियां कमजोर (Atrophy) हो जाती हैं और जोड़ जाम (Contracture) हो सकते हैं। व्यायाम करना है, लेकिन सही तरीके से और सही मात्रा में

1. आइसोमेट्रिक व्यायाम (Isometric Exercises)

यह एक्यूट फेज के लिए सबसे सुरक्षित व्यायाम है। इसमें मांसपेशियों को संकुचित (Contract) किया जाता है, लेकिन जोड़ को हिलाया नहीं जाता।

  • फायदा: इससे जोड़ पर घर्षण (Friction) या दबाव नहीं पड़ता, लेकिन मांसपेशी की ताकत बनी रहती है और उस क्षेत्र में तरल पदार्थ का संचार बेहतर होता है।
  • उदाहरण: * घुटने के लिए (Static Quadriceps): घुटने के नीचे एक तौलिया रोल करके रखें और घुटने से तौलिये को नीचे की ओर दबाएं। 5 सेकंड रोकें और छोड़ दें।
    • हाथों के लिए: एक नरम स्पंज या स्ट्रेस बॉल को बहुत हल्के हाथों से दबाएं (अधिक जोर न लगाएं)।
  • सावधानी: संकुचन (Contraction) अधिकतम (Maximal) नहीं होना चाहिए; इसे सब-मैक्सिमल (Sub-maximal) यानी हल्की ताकत के साथ करें।

2. एक्टिव-असिस्टेड रेंज ऑफ मोशन (Active-Assisted ROM)

जोड़ों की गतिशीलता (Mobility) बनाए रखने के लिए यह बहुत जरूरी है।

  • मरीज को अपने दर्द की सीमा (Pain-free limit) के भीतर ही जोड़ों को हिलाना चाहिए।
  • यदि मरीज खुद मूवमेंट करने में असमर्थ है, तो फिजियोथेरेपिस्ट या घर का कोई सदस्य बहुत ही हल्के हाथों से जोड़ को सहारा देकर (Supportive guidance) मूवमेंट करवा सकता है।
  • नियम: जोड़ को जबरदस्ती स्ट्रेच न करें। जितना आसानी से मुड़े, उतना ही मोड़ें। दिन में 1-2 बार प्रत्येक जोड़ का मूवमेंट करना पर्याप्त है ताकि कैप्सूल जाम न हो।

3. पोस्चर और पोज़िशनिंग (Posture and Positioning)

दर्द के कारण मरीज अक्सर अपने जोड़ों को मोड़ कर (Flexion) रखना पसंद करते हैं क्योंकि इससे कैप्सूल पर दबाव कम होता है। लेकिन लंबे समय तक ऐसा करने से स्थायी कॉन्ट्रैक्चर (Flexion Contracture) बन सकता है।

  • घुटने के नीचे हर समय तकिया लगाकर न सोएं।
  • रीढ़ की हड्डी को सीधा रखें और दिन में कुछ समय पेट के बल (Prone position) लेटने का प्रयास करें ताकि कूल्हे और घुटने सीधे रहें (यदि मरीज ऐसा करने में सहज हो)।

मरीज की काउंसलिंग: जोड़ों की सुरक्षा के सिद्धांत (Joint Protection Principles)

क्लीनिकल रिकवरी के लिए फिजियोथेरेपी क्लिनिक के बाहर, घर पर मरीज क्या करता है, यह बहुत महत्वपूर्ण है। मरीजों को अपनी दिनचर्या में एर्गोनॉमिक्स (Ergonomics) और ऊर्जा संरक्षण (Energy Conservation) को अपनाना चाहिए:

  1. बड़े जोड़ों का उपयोग करें: छोटे जोड़ों (जैसे उंगलियों) पर भार डालने के बजाय बड़े और मजबूत जोड़ों (जैसे कलाई या कोहनी) का उपयोग करें। उदाहरण के लिए, कोई बैग या थैला उठाते समय उसे उंगलियों से पकड़ने के बजाय अपनी बांह (Forearm) पर लटकाएं।
  2. पकड़ (Grip) को आसान बनाएं: रसोई के बर्तनों, पेन या टूथब्रश के हैंडल पर फोम या ग्रिप कवर लगाएं ताकि उन्हें पकड़ने में उंगलियों के जोड़ों पर कम जोर पड़े।
  3. लगातार काम करने से बचें (Pacing): काम के बीच-बीच में छोटे-छोटे ब्रेक लें। थकान को दर्द बढ़ने से पहले ही पहचान लें।
  4. सहायक उपकरणों का उपयोग (Assistive Devices): यदि घुटनों या कूल्हों में सूजन है, तो चलते समय वॉकर (Walker) या छड़ी (Cane) का उपयोग करें। इससे सूजे हुए जोड़ों पर शरीर का वजन कम पड़ेगा और कार्टिलेज का बचाव होगा।

एक्यूट फेज में क्या बिल्कुल न करें (Strict Contraindications)

  • डीप मसाज (Deep Friction Massage): सूजे हुए जोड़ों या मांसपेशियों पर गहरी मालिश या रगड़ न करें। इससे इन्फ्लेमेशन और बढ़ जाएगा।
  • रेसिस्टेंस ट्रेनिंग (Resistance/Weight Training): डंबल, वेट कफ (Weight cuffs) या रेजिस्टेंस बैंड का उपयोग इस अवस्था में सख्त मना है।
  • ओवरस्ट्रेचिंग (Overstretching): दर्द की सीमा से बाहर जाकर जोड़ों को खींचना लिगामेंट टियर (Ligament tear) का कारण बन सकता है।
  • हीट थेरेपी (Heat Therapy): जैसा कि पहले बताया गया है, किसी भी प्रकार की सिकाई (गर्म पानी या मशीन) का उपयोग न करें।

निष्कर्ष (Conclusion)

रुमेटीइड अर्थराइटिस में जब जोड़ों में तेज सूजन (Acute Flare-up) हो, तो फिजियोथेरेपी का मंत्र है: “सम्मान दें और सुरक्षित रखें” (Respect the pain, Protect the joint)

इस दौरान आराम, बर्फ की सिकाई (Cryotherapy), सही स्प्लिंटिंग और दर्द-रहित अवस्था में किए गए हल्के आइसोमेट्रिक व्यायाम मरीज के लिए सबसे अच्छी दवा हैं। एक बार जब सूजन और लालिमा कम हो जाए और बीमारी ‘सब-एक्यूट’ (Sub-acute) या क्रोनिक चरण में प्रवेश कर जाए, तब फिजियोथेरेपिस्ट धीरे-धीरे मांसपेशियों को मजबूत करने वाले व्यायाम (Strengthening exercises) और स्ट्रेचिंग प्रोटोकॉल को शुरू कर सकते हैं।

मरीजों को यह समझना आवश्यक है कि गठिया बाय के प्रबंधन में फिजियोथेरेपी एक लंबी प्रक्रिया है, और सूजन के समय सही सावधानियां अपनाकर वे भविष्य में होने वाली शारीरिक विकृतियों (Deformities) और विकलांगता से खुद को सुरक्षित रख सकते हैं।

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