कंधे में कट-कट की आवाज़ (शोल्डर इम्पिंजमेंट): कारण और उपचार
कंधे में कट-कट की आवाज़ आना (जिसे मेडिकल भाषा में “शोल्डर क्रेपिटस” कहा जाता है) और उसके साथ दर्द होना, आजकल एक बहुत आम समस्या बन गई है। यह समस्या खासतौर पर उन लोगों में देखी जाती है जो कंप्यूटर पर लंबे समय तक बैठकर काम करते हैं, जिम में भारी वज़न उठाते हैं, या ऐसे खेल खेलते हैं जिनमें हाथ को बार-बार सिर के ऊपर उठाना पड़ता है, जैसे बैडमिंटन, टेनिस, तैराकी या क्रिकेट।
इस समस्या का सबसे आम कारण “शोल्डर इम्पिंजमेंट सिंड्रोम” (Shoulder Impingement Syndrome) होता है।
इस लेख में हम विस्तार से समझेंगे कि कंधे में कट-कट की आवाज़ (शोल्डर इम्पिंजमेंट) क्या है, यह क्यों होता है, इसके लक्षण क्या हैं, इसका निदान कैसे किया जाता है, और इसके उपचार के कौन-कौन से तरीके उपलब्ध हैं।
शोल्डर इम्पिंजमेंट क्या है?
कंधा शरीर का सबसे ज़्यादा गति करने वाला जोड़ (जॉइंट) है। यह तीन हड्डियों से मिलकर बनता है — ह्यूमरस (बाजू की हड्डी), स्कैपुला (कंधे की चपटी हड्डी) और क्लैविकल (कॉलरबोन)। इन हड्डियों के बीच एक छोटी सी जगह होती है जिसे सबएक्रोमियल स्पेस कहते हैं। इसी जगह से होकर रोटेटर कफ की मांसपेशियों के टेंडन और एक “बर्सा” नामक द्रव से भरी थैली गुज़रती है, जो कंधे की गति को आसान बनाती है।
जब किसी कारणवश यह जगह संकरी हो जाती है, तो हाथ ऊपर उठाने पर रोटेटर कफ के टेंडन और बर्सा, ऊपर की हड्डी (एक्रोमियन) से रगड़ खाने लगते हैं या दब जाते हैं। इसी दबाव और रगड़ को “इम्पिंजमेंट” कहा जाता है। बार-बार रगड़ खाने से टेंडन में सूजन (टेंडिनाइटिस) और बर्सा में सूजन (बर्साइटिस) हो जाती है, जिससे दर्द और चटकने जैसी आवाज़ आने लगती है।
कंधे में कट-कट की आवाज़ क्यों आती है?
कंधे में क्लिकिंग या पॉपिंग आवाज़ के पीछे कई कारण हो सकते हैं:
- सूजे हुए टेंडन का हड्डी पर रगड़ना — जब रोटेटर कफ के टेंडन सूज जाते हैं, तो हाथ हिलाते समय वे एक्रोमियन हड्डी के नीचे से घर्षण के साथ गुज़रते हैं, जिससे आवाज़ आती है।
- बर्सा में सूजन — सूजी हुई बर्सा थैली भी हिलने पर आवाज़ पैदा कर सकती है।
- स्कैपुला की असामान्य गति — अगर कंधे की चपटी हड्डी (स्कैपुला) ठीक तरह से न घूमे, तो मांसपेशियां असामान्य तरीके से हिलती हैं, जिससे क्लिक की आवाज़ आ सकती है।
- कार्टिलेज का घिसना — उम्र बढ़ने के साथ जोड़ के भीतर के कार्टिलेज (उपास्थि) घिस सकते हैं, जिससे हड्डियां आपस में सीधे संपर्क में आती हैं और आवाज़ पैदा होती है।
- लैब्रम में चोट — कंधे की सॉकेट के किनारे मौजूद कार्टिलेज रिंग (लैब्रम) में चोट या फटन भी क्लिकिंग का कारण बन सकती है।
शोल्डर इम्पिंजमेंट के मुख्य कारण
1. बार-बार हाथ ऊपर उठाने वाली गतिविधियां
जो लोग बार-बार हाथ को सिर के ऊपर उठाते हैं — जैसे पेंटर, तैराक, बैडमिंटन या वॉलीबॉल खिलाड़ी, या भारी सामान ऊपर रखने वाले कामगार — उनमें यह समस्या ज़्यादा देखी जाती है। इसे कई बार “स्विमर्स शोल्डर” या “थ्रोअर्स शोल्डर” भी कहा जाता है।
2. खराब पोस्चर (मुद्रा)
लंबे समय तक झुककर बैठना, कंप्यूटर या मोबाइल पर आगे की ओर झुके हुए कंधों के साथ काम करना, इस वजह से कंधे आगे की ओर खिंच जाते हैं और सबएक्रोमियल स्पेस संकरी हो जाती है।
3. रोटेटर कफ की कमज़ोरी और मांसपेशियों में असंतुलन
अगर कंधे को स्थिर रखने वाली मांसपेशियां (खासकर रोटेटर कफ) कमज़ोर हों, तो ह्यूमरस की हड्डी ऊपर की ओर खिसक जाती है, जिससे टेंडन पर दबाव बढ़ता है।
4. हड्डी की बनावट में बदलाव (बोन स्पर)
कई बार उम्र बढ़ने के साथ एक्रोमियन हड्डी पर छोटी-छोटी हड्डी की बढ़त (बोन स्पर) बन जाती है, जो सबएक्रोमियल स्पेस को और संकरा कर देती है।
5. उम्र से जुड़ा घिसाव (डिजनरेशन)
40 वर्ष की उम्र के बाद टेंडन प्राकृतिक रूप से कमज़ोर और कम लचीले होने लगते हैं, जिससे इम्पिंजमेंट का खतरा बढ़ जाता है।
6. पुरानी चोट या दुर्घटना
कंधे पर सीधी चोट लगना, गिरना, या अचानक झटका लगने से भी टेंडन और बर्सा में सूजन हो सकती है।
7. कंधे की अस्थिरता (इंस्टेबिलिटी)
कुछ लोगों में कंधे का जोड़ स्वाभाविक रूप से ज़्यादा ढीला होता है, जिससे जोड़ में असामान्य गति होती है और इम्पिंजमेंट का खतरा बढ़ता है।
लक्षण (Symptoms)
शोल्डर इम्पिंजमेंट के मुख्य लक्षण इस प्रकार हैं:
- हाथ को कंधे की ऊंचाई से ऊपर उठाने पर दर्द होना (खासकर 60 से 120 डिग्री के बीच, जिसे “पेनफुल आर्क” कहा जाता है)
- हाथ हिलाने पर चटकने या कट-कट की आवाज़ आना
- कंधे के आगे या बाहरी हिस्से में दर्द, जो कभी-कभी बाजू तक फैल सकता है
- रात में करवट लेकर सोने पर दर्द बढ़ जाना, खासकर प्रभावित कंधे के बल सोने पर
- हाथ को पीठ के पीछे ले जाने या शर्ट पहनने जैसी हरकतों में तकलीफ
- कंधे में कमज़ोरी महसूस होना, खासकर वज़न उठाते समय
- समय के साथ कंधे की गति सीमित हो जाना (जकड़न)
अगर इसका समय पर इलाज न किया जाए, तो यह समस्या बढ़कर रोटेटर कफ के टेंडन में फटन (टियर) तक पहुंच सकती है, जो एक ज़्यादा गंभीर स्थिति है।
निदान (Diagnosis)
डॉक्टर आमतौर पर निम्नलिखित तरीकों से इसका निदान करते हैं:
- शारीरिक परीक्षण — डॉक्टर कंधे को अलग-अलग दिशाओं में हिलाकर देखते हैं कि किस मूवमेंट में दर्द या आवाज़ आती है। इसमें “नीयर टेस्ट” और “हॉकिन्स-केनेडी टेस्ट” जैसे विशेष टेस्ट शामिल हैं।
- एक्स-रे — हड्डी की बनावट, बोन स्पर या जोड़ में किसी बदलाव को देखने के लिए।
- अल्ट्रासाउंड — टेंडन और बर्सा की सूजन को देखने के लिए एक तेज़ और आसान तरीका।
- एमआरआई (MRI) — अगर रोटेटर कफ में फटन का शक हो, तो एमआरआई से टेंडन की पूरी स्थिति साफ तौर पर दिखाई देती है।
उपचार (Treatment)
शोल्डर इम्पिंजमेंट का इलाज ज़्यादातर मामलों में बिना ऑपरेशन (कंज़र्वेटिव तरीके) से ही हो जाता है। गंभीर मामलों में ही सर्जरी की ज़रूरत पड़ती है।
1. आराम और गतिविधियों में बदलाव
जिन हरकतों से दर्द बढ़ता है, जैसे हाथ को बार-बार ऊपर उठाना या भारी वज़न उठाना, उन्हें कुछ समय के लिए कम करना या टालना ज़रूरी है। पूरी तरह हाथ को स्थिर रखने की सलाह आमतौर पर नहीं दी जाती, क्योंकि इससे जकड़न बढ़ सकती है।
2. बर्फ और गर्म सिकाई
शुरुआती दर्द और सूजन में बर्फ की सिकाई (दिन में 2-3 बार, 15-20 मिनट) फायदेमंद होती है। बाद के चरण में हल्की गर्म सिकाई से मांसपेशियों को आराम मिलता है।

3. दवाइयां
डॉक्टर की सलाह से नॉन-स्टेरॉयडल एंटी-इन्फ्लेमेटरी दवाइयां (NSAIDs) जैसे आइबुप्रोफेन या डाइक्लोफेनाक सूजन और दर्द कम करने में मदद करती हैं। इन्हें बिना डॉक्टरी सलाह के लंबे समय तक नहीं लेना चाहिए।
4. फिज़ियोथेरेपी और व्यायाम
यह इलाज का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है। फिज़ियोथेरेपिस्ट की देखरेख में किए जाने वाले व्यायाम से रोटेटर कफ और स्कैपुला को स्थिर करने वाली मांसपेशियां मज़बूत होती हैं। इनमें शामिल हैं:
- पेंडुलम एक्सरसाइज — हल्के-हल्के हाथ को झुलाना, जिससे जकड़न कम होती है

- रोटेटर कफ स्ट्रेंथनिंग — इलास्टिक बैंड की मदद से हल्के प्रतिरोध वाले व्यायाम

- स्कैपुलर स्टेबिलाइज़ेशन एक्सरसाइज — कंधे की चपटी हड्डी को स्थिर करने वाले व्यायाम

- स्ट्रेचिंग — कंधे और पीठ की मांसपेशियों को खींचने वाले व्यायाम, जिससे लचीलापन बढ़ता है

व्यायाम हमेशा किसी योग्य फिज़ियोथेरेपिस्ट की सलाह से ही शुरू करने चाहिए, क्योंकि गलत तरीके से किया गया व्यायाम स्थिति को बिगाड़ भी सकता है।
5. मुद्रा सुधार (पोस्चर करेक्शन)
बैठने और खड़े होने के तरीके में सुधार, खासकर कंप्यूटर पर काम करते समय कंधों को पीछे और नीचे रखना, इस समस्या को दोबारा होने से रोकने में मदद करता है।
6. कॉर्टिकोस्टेरॉयड इंजेक्शन
अगर दर्द बहुत ज़्यादा हो और सामान्य इलाज से आराम न मिले, तो डॉक्टर सबएक्रोमियल स्पेस में स्टेरॉयड इंजेक्शन देने की सलाह दे सकते हैं। यह सूजन को जल्दी कम करता है, लेकिन इसे बार-बार लेना सही नहीं माना जाता क्योंकि इससे टेंडन कमज़ोर हो सकते हैं।
7. सर्जरी (जब ज़रूरी हो)
अगर 6 महीने से ज़्यादा समय तक कंज़र्वेटिव इलाज के बावजूद आराम न मिले, या रोटेटर कफ में गंभीर फटन हो, तो आर्थ्रोस्कोपिक सबएक्रोमियल डीकंप्रेशन नामक सर्जरी की जाती है। इसमें दूरबीन (आर्थ्रोस्कोप) की मदद से बोन स्पर हटाकर और सूजी हुई बर्सा को निकालकर सबएक्रोमियल स्पेस को चौड़ा किया जाता है। यह एक मिनिमली इनवेसिव सर्जरी है जिसमें रिकवरी अपेक्षाकृत तेज़ होती है।
रोकथाम (Prevention) के उपाय
- नियमित रूप से कंधे और पीठ की मांसपेशियों को मज़बूत करने वाले व्यायाम करें
- वज़न उठाते समय सही तकनीक अपनाएं और अचानक झटके से बचें
- लंबे समय तक एक ही मुद्रा में काम करने से बचें, बीच-बीच में ब्रेक लें
- खेल या जिम शुरू करने से पहले वॉर्म-अप ज़रूर करें
- हाथ ऊपर उठाने वाली गतिविधियों को धीरे-धीरे और सही तकनीक के साथ बढ़ाएं
- कंधे में दर्द या असहजता महसूस होते ही उसे नज़रअंदाज़ न करें
डॉक्टर से कब मिलें?
अगर निम्नलिखित में से कोई भी लक्षण दिखाई दे, तो जल्द से जल्द किसी ऑर्थोपेडिक डॉक्टर या फिज़ियोथेरेपिस्ट से सलाह लेनी चाहिए:
- कंधे का दर्द 1-2 हफ्तों में आराम करने पर भी कम न हो
- रात में दर्द के कारण नींद में बार-बार खलल पड़े
- हाथ उठाने में अचानक कमज़ोरी महसूस हो
- चोट लगने के बाद कंधे में तेज़ दर्द और सूजन हो
- रोज़मर्रा के काम जैसे बाल संवारना, कपड़े पहनना मुश्किल हो जाए
निष्कर्ष
कंधे में चटकने की आवाज़ और दर्द, यानी शोल्डर इम्पिंजमेंट, एक ऐसी समस्या है जो समय पर ध्यान न देने पर बढ़ सकती है, लेकिन सही जानकारी और समय पर इलाज से इसे पूरी तरह ठीक किया जा सकता है। ज़्यादातर मामलों में आराम, सही मुद्रा, फिज़ियोथेरेपी और मांसपेशियों को मज़बूत करने वाले व्यायामों से ही अच्छा सुधार देखने को मिलता है। सर्जरी की ज़रूरत बहुत कम मामलों में ही पड़ती है। अगर आपको या आपके किसी परिचित को यह लक्षण महसूस हों, तो लक्षणों को नज़रअंदाज़ करने के बजाय समय रहते किसी योग्य डॉक्टर से जांच करवाना सबसे बेहतर विकल्प है।
