टार्सल टनल सिंड्रोम पैरों के तलवों में भयंकर जलन, सूनापन और रात में दर्द बढ़ने के असली कारण और फिजियो।
पैरों के तलवों में लगातार जलन होना, ऐसा महसूस होना जैसे सुइयां चुभ रही हों, और रात के समय दर्द का इतना बढ़ जाना कि नींद टूट जाए — ये सब बेहद परेशान करने वाले लक्षण हैं। अक्सर लोग इसे केवल दिनभर की थकान, विटामिन की कमी या बढ़ती उम्र का असर मानकर नजरअंदाज कर देते हैं। लेकिन, अगर यह समस्या लगातार बनी हुई है, तो यह टार्सल टनल सिंड्रोम (Tarsal Tunnel Syndrome – TTS) का स्पष्ट संकेत हो सकता है।
यह ठीक वैसा ही है जैसे हाथों में ‘कार्पल टनल सिंड्रोम’ (Carpal Tunnel Syndrome) होता है, लेकिन यह पैरों में होता है। आइए इस बीमारी की जड़ों, रात में बढ़ने वाले दर्द के विज्ञान और फिजियोथेरेपी के जरिए इसके पक्के इलाज को विस्तार से समझते हैं।
टार्सल टनल (Tarsal Tunnel) आखिर है क्या?
टार्सल टनल हमारे टखने (Ankle) के अंदरूनी हिस्से में स्थित एक संकरा रास्ता या ‘गुफा’ (Tunnel) होता है।
- इसकी दीवारें: यह टनल एक तरफ टखने की हड्डी (Medial Malleolus) और दूसरी तरफ एक बेहद सख्त और मोटे बैंड (Flexor Retinaculum) से घिरी होती है।
- इसके अंदर क्या होता है?: इस टनल के अंदर से पैर को सप्लाई करने वाली नसें (Veins), धमनियां (Arteries), टेंडन (Tendons) और सबसे महत्वपूर्ण पोस्टीरियर टिबियल नर्व (Posterior Tibial Nerve) गुजरती है।
जब किसी कारण से इस टनल के अंदर जगह कम हो जाती है या सूजन आ जाती है, तो यह ‘पोस्टीरियर टिबियल नर्व’ दबने लगती है। नस के इस तरह दबने (Compression) को ही मेडिकल भाषा में टार्सल टनल सिंड्रोम कहा जाता है।
लक्षण: कैसे पहचानें कि यह टार्सल टनल सिंड्रोम ही है?
इस बीमारी के लक्षण धीरे-धीरे शुरू होते हैं और फिर भयंकर रूप ले लेते हैं। इसके मुख्य लक्षण निम्नलिखित हैं:
- तलवों में भयंकर जलन (Severe Burning Sensation): ऐसा लगता है जैसे पैर आग पर रखे हों या तलवों में मिर्ची लगा दी गई हो। यह जलन एड़ी से शुरू होकर पंजों तक जा सकती है।
- सूनापन और झुनझुनी (Numbness and Tingling): पैर के निचले हिस्से, एड़ी और उंगलियों में ‘पिन और सुइयां’ चुभने जैसा अहसास होता है। कई बार पैर सुन्न पड़ जाता है, जिससे जमीन पर पैर रखने में भी अजीब महसूस होता है।
- दर्द का फैलना (Radiating Pain): यह दर्द केवल एक जगह नहीं रहता। यह टखने के अंदरूनी हिस्से से शुरू होकर पैर के तलवे, उंगलियों और कभी-कभी पिंडली (Calf muscle) तक ऊपर की ओर भी जा सकता है।
- खड़े रहने या चलने पर दर्द बढ़ना: जो लोग प्रोफेशन के कारण लंबे समय तक खड़े रहते हैं (जैसे टीचर्स, शेफ, ट्रैफिक पुलिस), उन्हें यह दर्द बहुत जल्दी और तेज होता है।
रात में दर्द क्यों बढ़ जाता है? (The Science of Night Pain)
मरीजों की सबसे बड़ी शिकायत होती है कि “डॉक्टर साहब, दिन में फिर भी काम चल जाता है, लेकिन रात को लेटते ही पैरों में भयंकर जलन और टीस उठने लगती है।” इसके पीछे कुछ स्पष्ट शारीरिक और वैज्ञानिक कारण हैं:
- तरल पदार्थ का जमाव (Fluid Accumulation): दिन भर खड़े रहने या बैठने से गुरुत्वाकर्षण (Gravity) के कारण पैरों में थोड़ा-बहुत फ्लूइड (तरल पदार्थ) जमा हो जाता है। रात में जब आप लेटते हैं, तो यह फ्लूइड टखने के आसपास सेटल होने लगता है, जिससे टनल के अंदर दबाव (Pressure) और बढ़ जाता है और दबी हुई नस पर सीधा असर पड़ता है।
- सोते समय पैर की पोजीशन (Foot Position during Sleep): सोते समय हमारे पैर स्वाभाविक रूप से थोड़ा नीचे की तरफ लटके हुए या मुड़े हुए (Plantar flexion) होते हैं। यह पोजीशन टार्सल टनल को और भी संकरा कर देती है, जिससे नस (Nerve) खिंचती है और जलन पैदा होती है।
- न्यूरोपैथिक दर्द की प्रकृति (Nature of Neuropathic Pain): नसों से जुड़ा कोई भी दर्द रात में ज्यादा महसूस होता है। दिन में हमारा दिमाग काम, शोर और अन्य गतिविधियों में व्यस्त रहता है, इसलिए दर्द के सिग्नल्स थोड़े दब जाते हैं (Gate Control Theory)। रात के सन्नाटे में, दिमाग के पास फोकस करने के लिए केवल वही दर्द होता है, जिससे जलन और सूनापन बहुत भयंकर लगने लगता है।
बीमारी की जड़: टार्सल टनल सिंड्रोम के असली कारण
यह सिंड्रोम रातों-रात नहीं होता। इसके पीछे कई कारण हो सकते हैं, जिन्हें समझना इलाज के लिए बहुत जरूरी है:
- बायोमैकेनिकल समस्याएं (Flat Feet या चपटे पैर): यह सबसे आम कारण है। जिन लोगों के पैरों में आर्च (Arch) नहीं होता (चपटे पैर), जब वे चलते हैं तो उनका पैर अंदर की तरफ ज्यादा झुकता है (Overpronation)। इससे टखने के अंदरूनी हिस्से की नसों पर लगातार अत्यधिक खिंचाव पड़ता है।
- सूजन और चोट (Inflammation and Trauma): टखने में मोच (Ankle Sprain), फ्रैक्चर या किसी पुरानी चोट के कारण टनल के आसपास के टिशू सूज जाते हैं, जो नस को दबाने लगते हैं।
- सिस्ट या हड्डी का बढ़ना (Space-occupying Lesions): कई बार टनल के अंदर कोई गांठ (Ganglion Cyst), लिपोमा (Lipoma), या हड्डी का एक्स्ट्रा टुकड़ा (Bone Spur) बन जाता है। टनल पहले से ही संकरी होती है, और इस एक्स्ट्रा चीज के आने से नस के लिए जगह नहीं बचती।
- सिस्टेमिक बीमारियां (Systemic Conditions): डायबिटीज (Diabetes) नसों को कमजोर कर देती है, जिससे वे दबाव के प्रति ज्यादा संवेदनशील हो जाती हैं। इसके अलावा, रुमेटीइड अर्थराइटिस (Rheumatoid Arthritis) में जोड़ों में सूजन आ जाती है, जो टार्सल टनल को ब्लॉक कर सकती है।
- गलत फुटवियर और ओवरयूज: बहुत ज्यादा टाइट जूते पहनना, ऊँची हील्स का लगातार प्रयोग, या बिना आराम किए लगातार कई घंटों तक कठोर जमीन पर खड़े रहने से भी यह समस्या जन्म लेती है।
निदान: इसकी पक्की जांच कैसे होती है?
डॉक्टर या फिजियोथेरेपिस्ट कुछ खास टेस्ट के जरिए इसका पता लगाते हैं:
- टिनेल साइन (Tinel’s Sign): डॉक्टर आपके टखने के अंदरूनी हिस्से (जहां नस होती है) पर उंगली या हैमर से हल्का सा टैप (थपथपाना) करते हैं। अगर आपको पैर के तलवे में बिजली का करंट लगने या झुनझुनी जैसा महसूस हो, तो टेस्ट पॉजिटिव माना जाता है।
- डार्सीफ्लेक्शन-एवर्जन टेस्ट: पैर को एक खास एंगल में स्ट्रेच किया जाता है जिससे टनल पर दबाव बढ़ता है। अगर दर्द बढ़ जाए, तो यह TTS का संकेत है।
- इमेजिंग (MRI / Ultrasound): अगर डॉक्टर को किसी सिस्ट या हड्डी के बढ़ने का शक होता है, तो टनल के अंदर की स्थिति देखने के लिए ये स्कैन किए जाते हैं।
- नर्व कंडक्शन वेलोसिटी (EMG / NCV): यह टेस्ट मापता है कि आपकी पोस्टीरियर टिबियल नर्व कितनी तेजी से इलेक्ट्रिकल सिग्नल भेज रही है। यदि नस दबी हुई है, तो सिग्नल की स्पीड कम हो जाती है।
टार्सल टनल सिंड्रोम की फिजियोथेरेपी और इलाज
टार्सल टनल सिंड्रोम का इलाज इसके कारण पर निर्भर करता है, लेकिन शुरुआती और मध्यम स्थिति में फिजियोथेरेपी इसे पूरी तरह ठीक करने में सबसे कारगर है।
1. दर्द और सूजन को कम करना (शुरुआती चरण)
- R.I.C.E थेरेपी: Rest (आराम), Ice (बर्फ की सिकाई), Compression (क्रेप बैंडेज), और Elevation (पैर को तकिए पर ऊंचा रखना)। बर्फ की सिकाई दिन में 3-4 बार 15-15 मिनट के लिए करें, इससे नस की सूजन तुरंत कम होती है।
- इलेक्ट्रोथेरेपी (Electrotherapy): फिजियोथेरेपिस्ट सूजन और दर्द को गहराई से खत्म करने के लिए अल्ट्रासाउंड थेरेपी (Ultrasound) और नसों के दर्द को सुन्न करने के लिए TENS (Transcutaneous Electrical Nerve Stimulation) मशीन का प्रयोग करते हैं।
2. स्ट्रेचिंग एक्सरसाइज (लचीलापन बढ़ाना)
जब मांसपेशियां टाइट होती हैं, तो वे नसों पर दबाव डालती हैं।
- काफ स्ट्रेच (Calf Stretch): दीवार की तरफ मुंह करके खड़े हों। जिस पैर में दर्द है उसे पीछे रखें और सीधा रखें। आगे वाले पैर को घुटने से मोड़ें और दीवार को धक्का दें। पीछे वाले पैर की पिंडली (Calf) में खिंचाव महसूस होगा। इसे 30 सेकंड तक रोकें, 3 बार करें।
- प्लांटर फेशिया स्ट्रेच (Plantar Fascia Stretch): कुर्सी पर बैठ जाएं। दर्द वाले पैर को दूसरे पैर के घुटने पर रखें। अब अपने हाथ से पैर की सभी उंगलियों को पकड़कर पीछे की तरफ (अपनी ओर) खींचें जब तक कि तलवे में खिंचाव न आए।
3. नर्व ग्लाइडिंग या न्यूरल मोबिलाइजेशन (Nerve Gliding)
यह बहुत ही विशेष तकनीक है। नसें रबर बैंड की तरह खिंचती नहीं हैं, वे अपने रास्ते (टनल) में खिसकती (Glide) हैं। जब नसें टनल में चिपक जाती हैं, तो दर्द होता है।
- कैसे करें: कुर्सी पर बैठें। पैर को सीधा हवा में उठाएं। अब पंजों को अपनी तरफ खींचें और फिर नीचे की तरफ पॉइंट करें। इसे बहुत धीरे-धीरे और लयबद्ध तरीके से (10-15 बार) करें। यह नस को टनल के अंदर फ्री करने में मदद करता है। (नोट: इसे दर्द की सीमा के अंदर ही करें)।
4. मांसपेशियों को मजबूत करना (Strengthening)
पैर के आर्च (Arch) को सपोर्ट देने वाली मांसपेशियों को मजबूत करना बहुत जरूरी है ताकि फ्लैट फीट की समस्या नर्व को परेशान न करे।
- टॉवेल कर्ल (Towel Curls): जमीन पर एक तौलिया बिछाएं। कुर्सी पर बैठकर अपने नंगे पैर से तौलिए को अपनी उंगलियों से पकड़कर अपनी तरफ खींचने (इकट्ठा करने) की कोशिश करें।
- मार्बल पिकअप: जमीन पर कुछ कंचे (Marbles) डाल दें। पैर की उंगलियों से एक-एक कंचा उठाएं और एक कटोरी में डालें।
5. बायोमैकेनिक्स और जूतों में सुधार (Footwear & Orthotics)
अगर कारण ‘फ्लैट फीट’ है, तो दुनिया की कोई भी दवाई तब तक काम नहीं करेगी जब तक आप जूतों में सुधार नहीं करते।
- कस्टम आर्च सपोर्ट (Arch Supports): जूतों के अंदर सिलिकॉन या फोम के खास इनसोल (Insoles) डालें जो पैर के गिरे हुए आर्च को ऊपर उठाएं। इससे टखने पर पड़ने वाला दबाव तुरंत आधा हो जाता है।
- चौड़े जूते (Wide Toe Box): ऐसे जूते पहनें जो आगे से चौड़े हों और टखने के पास ज्यादा टाइट न हों।
मेडिकल और सर्जिकल विकल्प
अगर 6 से 8 हफ्ते की लगातार फिजियोथेरेपी, सही जूतों और आराम के बाद भी दर्द और जलन कम नहीं होती है, या अगर MRI में कोई बड़ी गांठ (Cyst) नजर आती है, तो डॉक्टर निम्नलिखित कदम उठाते हैं:
- कॉर्टिकोस्टेरॉइड इंजेक्शन (Corticosteroid Injections): सूजन को तुरंत खत्म करने के लिए टनल के अंदर स्टेरॉयड का इंजेक्शन लगाया जाता है।
- सर्जरी (Tarsal Tunnel Release): यह आखिरी विकल्प होता है। इस छोटी सी सर्जरी में सर्जन ‘फ्लेक्सर रेटिनाकुलम’ (उस लिगामेंट) को काट देते हैं जो नस को दबा रहा है। इससे टनल बड़ी हो जाती है और नस को फैलने के लिए जगह मिल जाती है।
निष्कर्ष:
टार्सल टनल सिंड्रोम का दर्द रात की नींद और दिन का सुकून दोनों छीन सकता है, लेकिन यह कोई लाइलाज बीमारी नहीं है। शुरुआत में ही बर्फ की सिकाई, सही जूतों का चुनाव, और फिजियोथेरेपिस्ट द्वारा बताई गई स्ट्रेचिंग व नर्व ग्लाइडिंग एक्सरसाइज से इस समस्या को 80-90% तक घर पर ही ठीक किया जा सकता है। दर्द को नजरअंदाज न करें, क्योंकि नस जितनी ज्यादा देर तक दबी रहेगी, उसका डैमेज उतना ही परमानेंट हो सकता है।
